गम न करें – २०

गम न करें आप इसका तजुर्बा कर चुके, बेटा फेल हुआ आपको गम हुआ तो क्या गम से वो कामयाब हो जायगा? वालिद की वफात हो गयी, आप शोक मन रहे हैं, तो क्या शोक से वो वापस आ जायेंगे. तिजारत में नुकसान हो गया. आप रंज करने लगे, तो क्या नुकसान फायदे में बदल जायगा. गम न करे, क्योंकि आप एक मुसीबत में गमगीन होंगे तो मसायब का ढेर लग जायगा. फुक्र (गरीबी) और फांका पर बेचैनी हुई, मुसीबत बढ़ गयी, दुश्मनों की बातें सोच कर फिक्रमंद हुए. इस तरह उनकी ही मदद कर बैठे.

गम न करें. गम न करना चाहिए के गम के साथ बड़ा घर, खूबसूरत बीबी, माल व दौलत, ओहदा व मनसब और लायक लड़के कुछ काम न देंगे. गम न कीजिये, के ठन्डे पानी को कडुवा बाग़ को सेहरा और जिंदगी को नाकाबिले बर्दाश्त कैदखाना बना देगा. आप गम क्यों करें, जब के दीन व अकीदा के नेमत हासिल है, घर में रहते हैं, रोटी खाते है, पानी पीते हैं, कपड़ा पहनते हैं, साथ देने व आराम पहुचने के लिए बीबी है फिर गम क्यों करें. जिंदगी की पांच जरूरते हैं खाना, कपड़ा, अपना मकान चाहे फूस का क्यों न हो, निकाह, सवारी. बाकी ख्वाहिशें हैं.

ख्वाहिशें कद से जब बड़ी होंगी, नित नयी उलझाने खड़ी होंगी.

गम न करें – १९

मायूसी- कल्व और रूह को सबसे ज्यादा तुरसुरु (बदमिजाज) बनाती है. लिहाजा अगर हँसना मुस्कुराना चाहते हो तो, मायूसी से लड़िये. फरहत आपको व तमाम लोगों को मिली है. कामयाबी का दरवाजा भी सबके लिए खुला है. अगर आप ये ख्याल करने लगेंगे के हम छोटे-छोटे कामों के लिए पैदा हुए हैं तो जिंदगी में छोटे ही काम कर सकते हैं.

जब आप ये समझें कि हम भी बड़े कामों के लिए बने हैं तो आप में इतनी हिम्मत पैदा हो जायगी जिससे सारी रुकावटें और अड़चने ख़तम हो जायगी. आप अपने बुलंद मकसद और वसी मैदान को पा लेंगे. जिंदगी में इसका तजुर्बा बराबर होता रहता है. मसलन, जो शख्स 100 मीटर दौड़ में हिस्सा लेगा, 100 मीटर दौड़ कर थक जायगा. मगर जो 500 मीटर या 1000 मीटर दौड़ में हिस्सा लेगा वो 1000 मीटर दौड़ कर थकेगा.

लिहाजा अपना मकसद मुत्तैयन कीजिये. बुलंदी मुश्किल से हासिल होती है. बड़ा मकसद ये है, जितना मुमकिन हो लोगों के लिए खैर, भलाई व खूबी का सरचश्मा बनें. ऐसे सूरज बन जाएँ, जिससे रौशनी, मुहब्बत और खैर का उजियारा फैले.

आज जिस तरह का माहौल है, हर तरफ नफरत ही नफरत है. इन्सान समझ नहीं पा रहा है.

लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में.
यहाँ पर सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है.

हमें जहाँ रहना है, जहाँ हमारे बच्चों को रहना है, उस जगह को प्यार, मुहब्बत, भाईचारगी, भलाई, खैर की जगह बनायें. आज की तारीख में इससे बड़ा मकसद-ए-जिंदगी कोई नहीं.

चिन्तन – ०४

शैक्षणिक प्रतिबद्धताएँ –

बच्चों के छेत्र में कार्य करने वालों में विशेष कर शिक्षकों में अपेक्षित प्रमुख शीलगुणों ( Traits ) में- कोमल हिर्दय, संवेदनशील, मृदुभाषी व्यक्तित्व, परानुभूति संपन्न व्यक्तित्व, वात्सल्यता, ममत्व, बच्चों की तरह सोचने वाले, त्वरित निर्णय और बाल हित में सोचने वाले, समय देने वाले, आपातस्थिति में उपलब्ध होने वाले, परिपक्व मस्तिष्क वाले व्यक्तित्व, ज्ञानवान आदि होने चाहिए। साथ ही नेतृत्व का कमान उन्हें दी जानी चाहिये जो कुशलता के साथ समदर्शी भाव से पूरी टीम के साथ समयोजनशीलता, तारतम्य व समझ विकसित करें, तब जाकर ही नेतृत्व शैली प्रगाढ़ बन पाएगी।

बच्चों के छेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तित्व के चुनाव में ध्यान दिये जाने की जरूरत है- लिखित परीक्षा, मौखिक परीक्षा। साथ साथ Aptitude Test से व्यक्ति के अंदर छिपे भाव को भी जाना जा सकता है। बच्चे देश के कर्णधार माने गये हैं, इस परिपेक्ष्य में बच्चों के अधिकार व सरंक्षण कर रहे व्यक्तियों के पारदर्शिता से चुनाव किये जाने से ज़िले, राज्य और राष्ट्र में इसका व्यापक प्रभाव दिख पायेगा।

शिक्षा व्यवसाय नहीं अपितु जीवन ध्येय है। शिक्षक के चरित्र, ज्ञान व प्रतिबद्धता से ही छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं चरित्र निर्माण संभव है। शिक्षक में चार तरह की प्रतिबद्धता अतिआवश्यक है-

पहला- छात्रों के प्रति प्रतिबद्धता- यहां पाठ्यक्रम के विषयों को रोचक बनाना, छात्रों में मूल्य बोध कराना, साथ ही साथ छात्रों के जीवन को दिशा दिये जाने प्रथम प्रतिबद्धता है।

दूसरा- शिक्षक का विषय के प्रति प्रतिबद्धता- विषय पर नियंत्रण व प्रभावी ढंग से अभिव्यक्ति, साथ ही साथ नियमित अभ्यास अनिवार्य रूप से छात्रों को कराया जाना दूसरी प्रतिबद्धता के अंतर्गत आती है।

तीसरा- समाज के प्रति प्रतिबद्धता- शिक्षक को विद्यालय, महाविद्यालय एवं यूनिवर्सिटी के छात्रों में सामाजिक जागरूकता, चेतना, संवेदना जगाने एवं उसमें राष्ट्र भक्ति के संस्कार देने के संभावित प्रयास किये जाने चाहिए।

चौथा- स्वयं के प्रति प्रतिबद्धता- शिक्षा देना व्यवसाय नही, अपितु ध्येय है। शिक्षा देना यह मनुष्य के निर्माण का कार्य है।

उपरोक्त चार तरह की प्रतिबद्धता से छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र, सर्वांगीण एवं चहुमुँखीं विकास की जा सकती है। शिक्षक अगर ज्ञानवान, प्रखर, ओज वान, कौशल विकास में निपुण, अभिप्रेरणात्मक स्तर बढ़ाने में निपुण, प्रतिस्पर्धात्मक चुनौती से छात्रों का सामना करवाने में निपुण होंगे, तो छात्रों के परिष्कृत व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन कर पाएंगे। जैसे शिक्षक होंगे, वैसे समाज का सृजन होता दिखेगा।

गम न करें – १८

जिंदगी एक फन है, ऐसा फन जिसे सीखा जाये, इन्सान के लिए ज्यादा बेहतर ये है कि अपनी जिंदगी में वह फूलों, खुशबुओं और मोहब्बत के लिए मेहनत करे, बजाये इसके कि अपने जेब भरने या बैंक बैलेंस बनाने के लिए मेहनत करे. जिंदगी अगर माल व दौलत जमा करने में खर्च की जाये, मोहब्बत, जमाल और रहमत पाने की कोई जद्दोजहद न की जाये तो ऐसी जिंदगी के मायने क्या हैं. बहुत से लोग जिंदगी की खुशियों के लिए अपनी आँखे खोलते ही नहीं. इन्हें बस दिरहम और दीनार दिखाई देता है.

वह खुबसूरत बाग़, खुबसूरत फूलों, उबलते चश्मों,  चहचहाते परिंदों से गुजरते तो हैं लेकिन इनके तरफ रुख नहीं करते. इनकी सारी तवज्जो आने और जाने वाले पैसों की तरफ होती है. होना तो ये चाहिए था कि रूपया पैसा खुशगवार जिंदगी का वसीला हो, लेकिन लोगों ने मामला उलट दिया है, और दिरहम और दीनार पाने के लिए खुशगवार जिंदगी को बेच दिया. आँखे हमें इसीलिए दी गयी कि हम कायनात की खूबसूरती को देखें लेकिन हम सिर्फ रूपया पैसा देखते हैं.

जारी….

गम न करें – १७

बे-मौके सब शरीफ

मतलब यह नहीं कि यह सीधे तौर पर आपके बारे में हैं. मतलब यह है कि यह उन सभी के बारे में है जो मौके पर शरीफ बनने का ढोंग रचते हैं और समय आने पर दूसरों को आगे कर खुद उनका समर्थन अथवा उनके साथ अथवा उनके पीछे चलने को तुरंत तैयार हो जाते हैं. इसलिए बे-मौके सब शरीफ से हमारा तात्पर्य यह है कि मौका आने पर अपनी शराफत दिखाने से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता, पर यह कि सिर्फ ख़बरों में आने के लिए या कि सिर्फ दिखावे के लिए.

आप कथनी और करनी में जितना कम अंतर रख पाते हैं उतने ही आप चरित्रवान होते हैं, यह नहीं कि आप चरित्रवान तो हों पर अवसर आने पर आप खिसक लें. यहाँ मेरा यह सब लिखना आप में से बहुतों को खल रहा होगा पर क्या करें तारीफ बनती भी होगी तो आप इसे मेरा दंभ न समझ ले इसलिए यह साफ करना जरुरी है कि मै इस लेख के माध्यम से आप सब को कुंठित नहीं करना चाहता हूँ. मेरा उद्देश्य बस इतना है कि हम अपने चरित्र के स्तर को उस ऊँचाई तक ले जा सकें जहाँ हम सचमुच ही अपने कथनी और करनी अंतर नहीं कर सकें अर्थात जैसा भी हम सोचें अथवा कहें उसपर चल भी सकें.

थोड़ी देर के लिए यह लेख आपको गप्पबाजी लग सकती है पर आप जरा ध्यान देकर इन बातों को सोचेंगे तो यही पाएंगे कि हम में से कितने ही अवसर आने पर किसी जन-कल्याणकारी कार्यों के लिए समय निकल पाते हैं? अधिकतर का उत्तर यही होगा कि अपने काम से फुर्सत मिले तभी ना. सही भी है, पर यह तभी संभव हो पाता है जब आप समय निकालना चाहें. क्या आप अपने परिवार के लिए समय नहीं निकाल पाते, क्या आप अपने किसी निजी कार्य के लिए समय नहीं निकाल पाते यदि आपका उत्तर हाँ है तो समस्या यह है कि समय आपको निकालना होता है इससे पहले कि समय आपको निकाल दे.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए समय निकाल पाते हैं अपितु यह कि आप किन बातों अथवा कार्यों के लिए स्वयं को अनुकूल पाते हैं. यदि नहीं तो फिर आप चाहें कि उक्त कार्यों के लिए भी आप समय निकालें. क्योंकि यह आपके ही हाथों में होता है पूर्णरुपेण. आप टालमटोल के शिकार महसूस होते हैं यदि आप चाह कर भी समय प्रबंधन नहीं कर पाते और इसका ठीकरा दूसरों के सर फोड़ने को उद्दत रहते हैं.

आईये इस उधेड़बुन से निकालें जीवन बहुत खुबसूरत है, इसका आनंद लीजिये, नहीं समझ आ रहा हो तो किसी मनोवैज्ञानिक से जरुर मिलें, आप पागल नहीं हैं पर इस स्थिति में अधिक देर रहना आपको जल्द ही उस श्रेणी में ला खड़ा कर सकता है, इसलिए कि कही और अधिक देर न हो जाये, अपने आपको, अपने लिए कुछ ऐसा करें जिससे आपके मन, आत्मा और चित्त को प्रसन्नता होती हो, साथ ही दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो ऐसे कृत्यों में स्वयं को उलझाएँ.

इसलिए गम न करें खुश रहें.

गम न करें – १६

दुनिया में आगर आप मोहताज या गमगीन हों या मर्ज लाहक हो जाए या आपका कोई हक मार ले या कोई जुल्म आप पर हो, तो आप हमेशा रहने वाली जगह जन्नत को याद कर लें. जब आप ऐसा करने लगेंगे और जन्नत को पाने के लिए नेक काम करने लगेंगे तो आपका नुकसान फायदे में बदल जायगा. मुसीबतें अतियात साबित होंगी.

सबसे अकलमन्द वही है जो आखरत के लिए काम करे, क्योंकि आखरत ही बेहतर और बाक़ी रहने वाली है. मख्लुकात (प्राणियों) में सबसे अहमक वो है जो दुनिया को अपना घर और आरामगाह और उम्मीदों का मरकज समझते हैं. इसीलिए जब मुसीबत पड़ती है तो बहुत घबरा जाते हैं. क्योंकि वो दुनिया की जिंदगी को ही सब कुछ समझ बैठे हैं. दुनिया की जिंदगी मुख्त्सर है. मरने के बाद की जिंदगी हमेशा और कायम रहने वाली है.

चिन्तन – ०३

सुप्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, हर्षोल्लास में व्यतीत हो।

देश की आजादी सही मायने में तभी चरितार्थ हो सकती है जब देश मे लिंग भेद के नाम पर वर्गीकरण न हो, महिलाओं, बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो व सम्मान मिले, शिक्षा व आजादी मिले। जीवन की दिशा तय करने का अधिकार मिले, अपने रुचि के मुताबिक अपने कैरियर को संवारने का मौका मिले, आजाद भारत में किसी भी महिला/बच्चों को अपना कैरियर चुनने का अधिकार भारतीय संविधान के मूल में वर्णित है जिस पर सारगर्भित अमल की जा सके। जीवन में महिलाएं / बच्चे इतना सक्षम बनें की अपनी जिंदगी की जरूरतों को खुद पूरा कर सकें, परजीवी प्रवृति त्यागकर आत्मनिर्भर, स्वाबलंबन की ओर उन्मुख हों।

महिलाएं/बच्चे इसके लिये माता-पिता, परिवार पर आश्रित न रहें, बल्कि अपना खुद का अस्तित्व बनायें। किसी के ऊपर आश्रित रहने से जरूरतें पूरी होती हैं, सपने नहीं। जीवन का आत्मस्वाभिमान सपनों को पंख दिये जाने में निहित है। खुद के सपनों को साकार बनाने के लिये पतंग की डोर अपने हाथों में रखनी जरूरी है। 21 वी सदी में महिलाओं, बच्चों को पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलकर खुद आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होने पर बल दिये जाने की जरूरत है, ताकि भारत उन्नति के बहुआयामी आयाम को छू पायें।

जिस देश की महिलाएं, बहनें, पत्नियाँ, माँ, बच्चे ताकतवर होंगे, वह देश समृद्धता की ओर उन्मुख होगा, अतुल्यता की ओर बढ़ेगा। देश के संविधान में लिंग भेद के नाम पर असमानता को दूर किये जाने पर बल, भातृत्व भावना को प्रबल किये जाने पर जोर, विश्व बंधुत्व की भावना पर बल आदि को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है। किसी देश की संविधान से वहाँ के नागरिकजनों को मार्गदर्शन प्राप्त होता है।  जय हिंद, जय भारत।

गम न करें – १५

कुछ लोग होते हैं, जिनके जेहन में, बिस्तर पर लेटे हुए आलमी जंग (world war) होती रहती है. इन्हें सुगर व ब्लड प्रेशर जैसी बीमारी हो जाती है. वाकयात से वो झुलसते रहते हैं. कीमतों में बढ़ोत्तरी हुई इन्हें गुस्सा आया, बारिश क्या हुई वो दहाड़ने लगे, करेंसी की कीमत कम हुई वो परेशान हो गए. इस तरह वो हमेशा मलाल व कलक की हालत में रहते हैं. हर आवाज को अपने ही खिलाफ समझते हैं. मेरा मशवरा है कि सारे जहाँ का दर्द लेकर मत फिरिए, हादसात जमीन में हो, आपके आंतो में न हो, बाज लोगों का दिल स्पंज होता है. जो हर तरह की गपबाजियों, अफवाहों को पीता रहता है. छोटी-छोटी बातों पर परेशान, मामूली ख़ुशी पर दिल बहार निकल जाता है. ऐसा दिल जिसका होता है उसकी शख्सियत ख़तम हो जाती है.

अहले हक की यह कैफियत होती है, इबरतें व नसीहतें इनके इमान में बढ़ोत्तरी करती हैं. हादसात और ट्रेजडियों के सामने तो एक बहादुर दिल ही ठहर सकता है. जो गैरतमंद व खुद्दार है वो अल्लाह के मदद व करम के मुश्तहक हैं. आप नेक काम करते रहिये, आपको कभी परेशान होने की जरुरत नहीं, क्योंकि अल्लाह आपके साथ है.

चिन्तन – ०२

शुभ प्रभात , आज का दिन मंगलमय और हर्षोल्लास में व्यतीत हो। जीवन की सार्थकता मौलिक चिंतन, सर्जनात्मक अभिव्यक्ति , निष्काम कर्म, सत्यग्राही , श्रमशीलता, सद्व्यवहार, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, सच्चरित्रता, न्यायनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, आध्यात्मिक चिंतन, अन्तःकरण की शुद्धता आदि में निहित है। उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तव्य की एक परिष्कृत जीवन पद्धति है जिसे आत्मसात करने पर व्यक्ति के भीतर आत्म संतोष और बाहर सम्मान प्राप्त होता है। वेदों में, आत्मा के परिष्कृत स्तर को परमात्मा की संज्ञा दी गयी है और उत्कृष्टता से भरा पूरा अन्तःकरण ही ब्रह्मलोक है। विवेकानंद का एक विचार दिल में आह्लादन की स्थिति लता है जो “कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से गर्त में नही जाता, बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी वजह होती है।” निडर बनें, कुछ प्रतिबद्ध लोग ही देश के लिये भलाई का कार्य कर सकते हैं।

इंसान के अंदर नैसर्गिक गुण- ममत्व, वात्सल्य, परानुभूति, कोमल हृदय, सच्चरित्र, बौद्धिक चातुर्य, निर्णय लेने की छमता, मर्यादा को पालन करने वाला, अपनी परिसीमाओं को समझने वाला, कुशल व्यवहार, परोपकारी, समाज के लिये लोकोपयोगी आदि हैं। इन नैसर्गिक गुणों से निर्मित व्यक्ति समाज के सृजनात्मक कार्यों में अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन करते हैं। व्यक्ति के किये गये कर्म से ही इंसानी स्वभाव या पशु अथवा दानव प्रवृति का बोध कराती है।

नेतृत्व के नैसर्गिक गुण जन्मजात होते हैं, इसे अर्जित नहीं किया जाता है। मनोवैज्ञानिको ने नेतृत्व के शीलगुण (Traits) सिद्धांत में इस संप्रत्यय की पुष्टि की है। मार्टिन लूथर किंग, महात्मा गाँधी, हिटलर, नेपोलियन आदि कई जन्मजात नेतृत्व योग्यता वाले व्यक्तियों को हम याद करते हैं। नेतृत्व के शीलगुणों में व्यक्ति के शारीरिक गुण- ऊँचाई, वजन, स्फूर्ति व अच्छा स्वास्थ्य /व्यक्तित्व शीलगुणों में- बुद्धि, आत्मविश्वास, शब्दाडंबर, प्रभुत्व, समायोजन, सामाजिकता, परिश्रम प्रियता, कल्पना व दूरदर्शिता, चमत्कार, संकल्प शक्ति/ईमानदार / अच्छा चरित्र / कर्मठ व निष्ठावान / प्रजातांत्रिक शैली से कार्य / कार्य उन्मुखी / समूह उन्मुखी / सहनशीलता / धैर्यवान / निर्भीक आदि होते हैं। नेतृत्व की कुशलता से ही समाज में परिवर्तन की अपेक्षा की जा सकती है।

गम न करें – १४

दायें बाएं देखिये हर तरफ मुसीबत जदा दिखाई देंगे. हर घर में हंगामा बरपा है. हर रुखसार पर आंसू है. हर वादी में मातम है. आप देखेंगे मुसीबत जदा आप तनहा नहीं. दूसरों के मुसीबत के मुकाबले में आपकी मुसीबत कम है. कितने ही मरीज हैं जो सालो साल से बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं. दर्द से कराहते रहते हैं. कितने जेलों में बंद हैं. सालों से इन्होने सूरज की रौशनी नहीं देखीं. कितनी औरतें हैं जिनके जिगर के टुकड़े नौजवानी में ही छीन लिए गए. कितने हैं जो परेशान हैं, कर्जदार हैं, मुसीबत में हैं. आप इनके जरिये तसल्ली हासिल करें. और अपने आप को मुसीबत का सामना करने का ऐसा आदी बनायें जैसे ऊंट सेहरा में चलने का आदी हो जाता है. जिंदगी के सफ़र में तवाज्जन (संतुलन) बरक़रार रखिये. अपने इर्द-गिर्द और पहले के लोगों के नमूने सामने रखिये, और इनके बीच अपना मुआज्जना (अंदाज) लगाईये तो पता चलेगा, आप इनसे बहुत ज्यादा बेहतर हैं.

आपको हल्का सा झटका लगा है. इस पर अल्लाह (भगवान) का शुक्र अदा करें. जो उसने ले लिया उसपर शबाब की उम्मीद रखिये. और अपने माहौल के लोगों को देख कर तसल्ली हासिल कीजिये. इस सिलसिले में आखिरी नबी हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अच्छी मिसाल हैं, के आपके सर पर ऊंट का ओझरी रखा गया, कदम जख्मी हुए, चेहरे पर चोटें आयीं, घाटी में बंद किया गया, दरख्तों के पत्ते खाने पड़े, अपना प्यारा शहर मक्का छोड़ना पड़ा, आपका बेटा और अक्सर बेटियां आपके जिंदगी में ही इंतकाल कर गयीं. हजरत मूसा अल्लैहिस्सल्लाम को तकलीफ दी गयी, हजरत ईसा अल्लैहिस्सल्लाम को सूली पर लटकाया गया. श्रीराम जी को बनवास जाना पड़ा, सीता जी को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी. इसीलिए ऋषियों ने इस संसार को दुखालय कहा है. दूसरों के मुकाबले हमारा गम कितना कम हैं, फिर भी हम गमगीन हैं?

जारी….