दिल टूट के गिरा यूँ!

|| दिल टूट के गिरा यूँ ||

 

दिल टूट के गिरा यूँ, मिट्टी का हो खिलौना |

फूलों से भी था नाजुक, काँटा बना बिछौना ||

 

क्यों अपने हुए पराये, गम ये बड़ा सताए |

वो तो हँस रहे हैं, मुझको ही क्यों रुलाये ||

थम जा ऐ! बहते आंसू दामन मेरा भिंगो ना |

दिल टूट के गिरा यूँ, मिट्टी का हो खिलौना |

 

एक ढोंग है ये दुनिया, धोके में जिंदगी है |

कागज की कश्तियाँ तो आग से जली हैं ||

सागर है ये ग़मों का साहिल मिले कहीं ना |

दिल टूट के गिरा यूँ, मिट्टी का हो खिलौना |

 

: रविन्द्र कुमार ‘रवि’

रविन्द्र कुमार 'रवि'

रविन्द्र कुमार ‘रवि’,
कवि, संगीतकार, गायक, साहित्यकार एवं एक शिक्षक
सेन्ट्रल कॉलोनी, मकोली, फुसरो, बोकारो, 829144
मोबाइल: 072098 17343