बस हम ही नहीं बदले

सर्वप्रथम हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि, यह जो लेख यहाँ से नीचे तक जो भी लिखा है उसका किसी जाति अथवा धर्म से बिना किसी पूर्वाग्रह के/से प्रेरित हुए लिखा जा रहा है, यद्यपि किसी धर्म विशेष की धार्मिक भावना आहत होती हो तो हमें क्षमा करेंगे. मेरी जाति या धर्म क्या है इसे जाने बिना इस लेख को निष्पक्ष भाव से पढने की कृपा सराहनीय होगी.

उपर्युक्त वाक्यों को पढ़ कर आपसे यह अपेक्षा की जा सकती है कि अब आप पूर्णतया तैयार हैं. कुरआन-ए-शरीफ में ‘तीन तलाक’ को ‘पाप’ की संज्ञा दी गयी है, परन्तु फिर भी सदियों से एक परंपरा के रूप में इसको हम वहन करते रहे. तुलसीदास जी ने भी कह डाला था ‘ढोल, पशु अरु नारी, ये सब हैं तारण के अधिकारी’ तो क्या उनकी इस बात को हमारा समाज आज चरितार्थ करता है? जरा आज आप इस मान्यता के पक्ष में सरेआम बोल कर दिखा दें! सभी महिला अधिकार संरक्षण वाले आपको अदालत में ना घसीट डाले तो फिर कहें.

वैसे ही आज के समाज में चाहे वह ‘तीन तलाक’ का विषय हो अथवा ‘दहेज़-प्रथा’ या महिलाओं के किसी भी प्रकार के/से शोषण का मामला हो हमारा समाज चुप कैसे रह सकता है. आज हमारे समाज का एक वर्ग कहे की ‘दहेज़-प्रथा’ हमारे धार्मिक भावना से सम्बंधित है और हमारे धर्म में किसी की दखलंदाजी पसंद नहीं, तो हम समझते हैं की उससे जाहिल वर्ग और कोई दूसरा हो हो नहीं सकता, परन्तु फिर भी ‘दहेज़-प्रथा’ कमोवेश पूरे समाज में आज भी जिन्दा है, उसी प्रकार ‘तीन-तलाक’ (छः महीने के लिए पाबन्दी) भी छः महीने बाद यदि कोई कानून नहीं बन पाया तो फिर से जिन्दा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.

आज दिनांक 22-08-2017 के माननीय सर्वोच्च न्यायलय के पांच जजों के पीठ में से तीन जजों ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा की यह संविधान की धारा 14 की अवमानना है तथा इससे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन होता है. जबकि दो जजों ने इसे धार्मिक भावना से सम्बंधित मामला बताकर संसद में कानून बनाने का सुझाव दिया है.

अब प्रश्न यह है की देश की 9 करोड़ महिलाएं अपने हक की आवाज किसे सुनाएँ, उन धर्म के ठेकेदारों को जो, जिनकी औलादें तो उच्च शिक्षा ग्रहण करती हैं पर उनके निगेहबानी में चल रहे मदरसों पर कडाई से धर्म के पालन पर बल दिया जाता है. ऐसा कतई नहीं की अन्य वर्ग की महिलाओं की स्थिति बहुत ही अच्छी है, पर ऐसा कहकर आप ‘तीन-तलाक’ को जायज तो नहीं कह सकते. समस्या विधवा विवाह को लेकर हमारे समाज में दोहरी राय रखने वालों से भी है. आज सायरा बानो की मेहनत रंग ले आयी, वो लगी रहीं अपने लक्ष्य को साधने में.

कुल मिलाकर आज की इस घटना ने पूरे समाज को आईना दिखा दिया की किसी भी काम को लगन से पूरा करने में जब आप लग जाते हैं तो पूरी कायनात आपके साथ हो लेती है. आखिर कब तक आप धर्म की आड़ में खुद को छिपाकर, खुद की रक्षा में लगे रहेंगे. ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ इसका अर्थ या यों कहे अनर्थ हम कब तक लगते रहेंगे? “धर्म उनकी ही रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करतें हैं.” तो, धर्म की रक्षा करना मतलब किसी धर्म में जो उनके/हमारे तथाकथित बाबा आदम ने कहा उसी से चिपके रहेंगे? आपने कभी किसी कंपनी का “जेनेरल टर्म्स एंड कंडीशन” यदि पढ़ा हो तो उसमे भी साफ़-साफ़ लिखा होता है, “किसी भी बिंदु पर समय-समय पर होने वाले परिवर्तन में आपको उसकी जिम्मेवारी स्वयं लेनी होगी”. ठीक उसी प्रकार, धर्म की रक्षा करना मतलब हथियार उठाकर सामने वाले को मार डालना नहीं होता है अपितु वैसों को धर्म की राह पर लाना होता है जो धर्म से भटक गए है.

धर्म में चलना (धर्मं चर) अर्थात वह सभी काम जिससे किसी का भला होता हो और साथ ही किसी का नुकसान भी न होता हो ऐसे कार्य ही धर्म की सूची में आ सकते है. ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए को हंसाया जाये’ तो भाई ये जिसने भी लिखा उसका तो फतवा बन भी गया होगा. भाई अगर ऐसा है तो आज से चाहे हम किसी भी वर्ग के हों अपनी धर्म नाम की गठरी अपने सर पर उठाकर नहीं चलें. उसे अपने घर के किसी कोने, न न, कोने नहीं, ऐसा भी क्या, किसी शानदार कोने में रख दे, क्योंकि जब आप अपने अपने घरों से बाहर होते हैं, तो आप सब का, हमारा भी एक ही धर्म होना चाहिए और वो है राष्ट्र धर्म सर्वोपरि.

वस्तुतः हमारे धर्म व धार्मिक पुस्तकें बहुत गूढ़ हैं हमारे समाज में उनका सही-सही विश्लेषण करने वालों के शख्त कमी है, जो जैसा चाहता है अपना नया अर्थ लगा लेता है, जिससे बेकार का विवाद उत्पन्न होता है, और हम जैसों को अवसर मिल जाता है कुछ कह ही डालने का, कि ठीक है ये सब पर अब क्या करें, “बस हम ही नहीं बदले, जमाना बदल गया.”

संपादक

नीरज पाठक, संपादक, फुसरो ई-पत्रिका. 9934109077 फुसरो ई-पत्रिका. फुसरो शहर की प्रथम व एकमात्र ई-पत्रिका, जिसमे आप अपने शहर के बारे में सभी प्रकार कि जानकारियां पा सकते हैं. आप अपनी रचनाएँ भी प्रकाशन हेतु भेज सकते हैं. हम सभी प्रकार कि रचनाओं को स्थान देते हैं, चाहे वह आलेख, कविता, कहानी, मंतव्य, संस्मरण, शिकायत, गीत, संगीत, चित्र हो या आपकी कोई अपनी कृति जिसे आप जग जाहिर करना चाहते हों.

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