बेटी बचाओ बेटी पढाओ
कविता
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|| बेटियाँ ||

नहीं बचाओ बेटी केवल उसे आज पढने दो,

चढ़ती है चोटी पर तो उसे आज चढ़ने दो,

बेटियां ही शक्ति का स्वरुप है,

बेटियां बिन छांव भी कभी धूप है,

चाहते क्यों न इन्हें आँगन मिले,

चाह लो माँ का इन्हें दामन मिले,

गिर रही जब बेटियां तुम थाम लो,

गर तुम गिरो तो बेटियों का नाम लो,

तुम नाम ले के देखो वो आयें नजर,

है पुत्र तो वो भूलता तेरी डगर,

है बेटियां तो दिख रही है शान्ति,

हो पुत्र ही सदा मिटाओ भ्रान्ति,

बेटियां ही सृष्टि का स्वरुप है,

उष्णता में भी वृष्टि का भी रूप है,

बेटियां बढ़े तो सारा जग बढ़े,

तब एक ना समस्त देखो पग बढ़े,

बेटियां हैं दूर तो भी पास हैं,

जैसे हो न सांस फिर भी आश है,

तुम देख लो दसो दिशा में जा कभी,

हर दिशा में बेटियां ही मिल रही,

बेटियां बढ़ाती आज मान है,

बेटियां बढ़ाती आज शान है,

बेटियां नहीं किसी से कम रही,

शोहरतें न आज उनकी थम रही,

काम करती आज भी बड़े-बड़े,

पुत्र तो रहे सदा डरे-डरे,

जिनके घर में आ रही हों बेटियां,

भर रही तिजोरियों से पेटियां,

बेटियां मिटाती अन्धकार है,

क्यों नहीं फिर आज वो स्वीकार है,

जन्म से पहले ही क्यों मरी है वो,

गर बच गयी तो आज क्यों डरी है वो,

जन्म से पहले उन्हें क्यों मारते,

तब जीत कर भी जंग को तुम हारते,

मैं चाहता तुम हार कर भी जीतते,

तो बुरे दिन आज तेरे बीतते.

राजेश पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखण्ड, गिरिडीह, झारखण्ड.

  • Lakshman Singh

    बहुत खूब ।सराहनीय कदम के लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं।

  • Shiv Kumar

    बेटी बचाव बेटी पढ़ाव

कविता
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क्षणिकाएं : ०४

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कविता
क्षणिकाएं : ०३

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कविता
क्षणिकाएं : ०२

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