बस यूँ ही! – ०१

आज-कल-परसों, बीत गए बरसों |
आप के वादों का हिसाब नहीं ||
कितनी मुश्किल में हाय मेरा दिल है |
और फुरसत में थे जनाब नहीं ||

ये तनहाइयाँ, ये यादों के मेले |
कभी भीड़ में, कभी हम अकेले ||

नींद आई नहीं, फिर भी सोया रहा |
मैं तुम्हारे ख़यालों में खोया रहा ||

मेरी आँखों में आके, दिल में उतरने वाले |
मुझे इतना तो बता, तेरा इरादा क्या है ||

सोचता है दिल जो, उसे कैसे मैं कहूं |
भूल जाऊं बातें सभी, होक रूबरू ||

गौर कर उस गरीब कि खुशियां,
कितने सदमो से भर गयी होंगी |
जिसे पैमाना-ए-दोस्ती देकर,
तेरी आँखे मुकर गयी होंगी ||

दिल धड़कने कि दुआ मांगता है |
ऐ मेरी जिंदगी! ये प्यार मेरा,
आपसे थोड़ी वफ़ा मांगता है ||

तुम ख्वाब थे एक, टूट जाना था |
पर मिले ही क्यों, गर रूठ जाना था ||
तुम the साक़ी मेरे, चाहे कुछ भी पिलाते |
जहर देते भी तो मुझे घूँट जाना था ||
मेरे दिल का खाजना था, तेरा सनम |
तेरे हाथों से ही, इसे लुट जाना था ||

: रविन्द्र कुमार ‘रवि’

 

रविन्द्र कुमार 'रवि'

रविन्द्र कुमार ‘रवि’,
कवि, संगीतकार, गायक, साहित्यकार एवं एक शिक्षक
सेन्ट्रल कॉलोनी, मकोली, फुसरो, बोकारो, 829144
मोबाइल: 072098 17343

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