क्षणिकाएं : ०५

|| ये क्या हो रहा सरकार है? ||

कली-कली बहार है,
पायल की झंकार
कहीं धनुष की टंकार है,
मनुज का निज संहार
ये कैसी ललकार है?
गम का अम्बार,
कहीं ख़ुशी का भंडार है|

मौत के आगोश में,
आसमां खामोश है|
दिल में गुबार
और नजर में खुमार है|
कुछ तो बोलिए
ये क्या हो रहा सरकार है?

मस्ती है लुत्फ़ में,
जमती है मुफ्त में|
गजब की ये दोस्ती,
निबह जाये तो यार है|
पर ‘हाँ’ मिल जाये,
तो ही बेड़ा पार है|

शादी में बर्बादी है,
ये जीवन की समाधी है|
क्योंकि फ़िक्र है हमें,
आज कितनी आबादी है|

भलाई है कमाई में,
नहीं धन कि गंवाई में
परेशान हो क्या?
इतने टैक्स की भरपाई में|

नींद नहीं आती, इतने मच्छर हैं काटते,
सब के सब चोर, और कोतवाल को हैं डांटते|
क्या ख़ास, क्या आम,
सबके तलवे रहो चाटते|
‘लूट’ की बन्दर बाँट है,
आओ मिलजुल कर बांटते|

मन कचरे की पेटी,
इसका नहीं है भान|
स्वांग नहीं तो क्या?
ये सफाई अभियान|

लगी है होड़ डिग्री में जीतिए,
मिले गर डिग्री, नौकरी तो दीजिए|
अरे आफत है समाधान,
आप ही कीजिए|

सड़ी हुई व्यवस्था में,
दुर्गन्ध की भरमार है,
क्या-क्या मैं तुम्हें बताऊँ,
किसको क्या दरकार है|
अरे अब भी तो बोलिए
ये क्या हो रहा सरकार है|

: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

दिल टूट के गिरा यूँ!

|| दिल टूट के गिरा यूँ ||

 

दिल टूट के गिरा यूँ, मिट्टी का हो खिलौना |

फूलों से भी था नाजुक, काँटा बना बिछौना ||

 

क्यों अपने हुए पराये, गम ये बड़ा सताए |

वो तो हँस रहे हैं, मुझको ही क्यों रुलाये ||

थम जा ऐ! बहते आंसू दामन मेरा भिंगो ना |

दिल टूट के गिरा यूँ, मिट्टी का हो खिलौना |

 

एक ढोंग है ये दुनिया, धोके में जिंदगी है |

कागज की कश्तियाँ तो आग से जली हैं ||

सागर है ये ग़मों का साहिल मिले कहीं ना |

दिल टूट के गिरा यूँ, मिट्टी का हो खिलौना |

 

: रविन्द्र कुमार ‘रवि’

बस यूँ ही! – ०१

आज-कल-परसों, बीत गए बरसों |
आप के वादों का हिसाब नहीं ||
कितनी मुश्किल में हाय मेरा दिल है |
और फुरसत में थे जनाब नहीं ||

ये तनहाइयाँ, ये यादों के मेले |
कभी भीड़ में, कभी हम अकेले ||

नींद आई नहीं, फिर भी सोया रहा |
मैं तुम्हारे ख़यालों में खोया रहा ||

मेरी आँखों में आके, दिल में उतरने वाले |
मुझे इतना तो बता, तेरा इरादा क्या है ||

सोचता है दिल जो, उसे कैसे मैं कहूं |
भूल जाऊं बातें सभी, होक रूबरू ||

गौर कर उस गरीब कि खुशियां,
कितने सदमो से भर गयी होंगी |
जिसे पैमाना-ए-दोस्ती देकर,
तेरी आँखे मुकर गयी होंगी ||

दिल धड़कने कि दुआ मांगता है |
ऐ मेरी जिंदगी! ये प्यार मेरा,
आपसे थोड़ी वफ़ा मांगता है ||

तुम ख्वाब थे एक, टूट जाना था |
पर मिले ही क्यों, गर रूठ जाना था ||
तुम the साक़ी मेरे, चाहे कुछ भी पिलाते |
जहर देते भी तो मुझे घूँट जाना था ||
मेरे दिल का खाजना था, तेरा सनम |
तेरे हाथों से ही, इसे लुट जाना था ||

: रविन्द्र कुमार ‘रवि’

 

क्षणिकाएं : ०४

|| भगवान ||

भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो.

सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो.

मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा.

किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा.

योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है.

न त्याग, ना ताप कि गरिमा, बड़ा कठिन वैराग्य है.

त्रिगुणित प्रकृतिप्राय तुम्हारी, पर गुणातिरेत समभाव है.

ताल विहीन बेसुर मैं प्राणी, मधुर प्रणय झंकार हो.

मैं मूढ़, विचलित मन मेरा, धीरज धर्म व ज्ञान हो.

भाव सागर बीच जीवन नैया , करुणा-सिन्धु पतवार हो.

चहुदिक हो धरा दिव्य सुवासित, अब तो वृष्टि समभाव हो.

ऐसी कृपा करो कृपानिधि, सत-पथ-गम संसार हो.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

क्षणिकाएं : ०३

|| कर्मयोगी ||

दु:सह्य वेदना,

असाध्यप्राय कार्य,

श्याह लक्ष्य,

निष्फल चेष्टा.

शून्य प्रतिफल,

व्यथा तेरे अंतर्मन की.

हे! प्राण प्रतिष्ठित,

किंचित न हो व्यथित,

शांत कर उदवेदना,

लक्ष्य का आह्वान कर,

तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी,

भाग्य का सत्कार कर.

क्या हुआ यदि गिर पड़ा,

चोटिल हो निष्प्राण नहीं.

चल उठ,

तोड़ अतीत की बेड़ियाँ,

नए शौर्य से हुंकार भर,

क्या भयभीत है?

नहीं,

असंयमित है.

निश्छल मन तेरा,

ज्यों दिव्य दर्पण,

भूल का संधान कर,

जीत तेरी निश्चित,

बस!

शोक त्याग,

शुभान्त कर.

क्षणिकाएं : ०२

|| वसुंधरा ||

सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई.

न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई.

कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता.

पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता.

अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ,

थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ गई.

ये कर्म क्षेत्र, जन्म भूमि, राम-कृष्ण-बुद्ध की,

आदि मानवता को ज्ञान दें, उन सैंकड़ो प्रबुद्ध की.

पुरुषार्थ में प्रवीणता, वो वीरता कहाँ गई.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

क्षणिकाएं : ०१

|| यौवन ||

आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण.

प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन.

उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण.

समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण.

विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण.

खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन.

संयुक्त मुक्त भुक्त है, हो रहा है चित्त हरण.

हर्षित प्रकृति रिक्त में, भरने लगी कर श्री वरण.

त्रिभुवन स्तब्ध है, संतप्त शक्त तत्व कण.

आकृष्ट हो निकृष्ट से, विभ्रांत दृष्टि आवरण.

-: रचना :-
: रविन्द्र कुमार ‘रवि’ :
शिक्षक, कवि एवं संगीतज्ञ
नया रोड, फुसरो.

मैडम आंगनबाड़ी के मस्टराईन सेवा में इनकर लागल रहीला

मैडम आंगनबाड़ी के मस्टराईन सेवा में इनकर लागल रहीला

म्यूजिक मंच की प्रस्तुति, मैडम आंगनबाड़ी के मस्टराईन भोजपुरी के सदाबहार गीतों पर फिल्माए गए गाने.

माय धन खा के सधाय दिहलू आज समियाना हिलाय दिहलू

माय धन खा के सधाय दिहलू आज समियाना हिलाय दिहलू

माय धन खा के सधाय दिहलू, भोजपुरी ठिठोली, रवि कुमार एवं साथी अभिनीत, भोजपुरी गीत संगीत एवं गायन, म्यूजिक मंच प्रस्तुति,

ढीला बा पाटी ढीला बा पावा काहे तबाह कैले बानि रावा

ढीला बा पाटी ढीला बा पावा काहे तबाह कैले बानि रावा

ढीला बा पाटी ढीला बा पावा, भोजपुरी ठिठोली, रवि कुमार एवं साथी अभिनीत, भोजपुरी गंवई गीत, म्यूजिक मंच प्रस्तुति,