चिन्तन – ०४

शैक्षणिक प्रतिबद्धताएँ –

बच्चों के छेत्र में कार्य करने वालों में विशेष कर शिक्षकों में अपेक्षित प्रमुख शीलगुणों ( Traits ) में- कोमल हिर्दय, संवेदनशील, मृदुभाषी व्यक्तित्व, परानुभूति संपन्न व्यक्तित्व, वात्सल्यता, ममत्व, बच्चों की तरह सोचने वाले, त्वरित निर्णय और बाल हित में सोचने वाले, समय देने वाले, आपातस्थिति में उपलब्ध होने वाले, परिपक्व मस्तिष्क वाले व्यक्तित्व, ज्ञानवान आदि होने चाहिए। साथ ही नेतृत्व का कमान उन्हें दी जानी चाहिये जो कुशलता के साथ समदर्शी भाव से पूरी टीम के साथ समयोजनशीलता, तारतम्य व समझ विकसित करें, तब जाकर ही नेतृत्व शैली प्रगाढ़ बन पाएगी।

बच्चों के छेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तित्व के चुनाव में ध्यान दिये जाने की जरूरत है- लिखित परीक्षा, मौखिक परीक्षा। साथ साथ Aptitude Test से व्यक्ति के अंदर छिपे भाव को भी जाना जा सकता है। बच्चे देश के कर्णधार माने गये हैं, इस परिपेक्ष्य में बच्चों के अधिकार व सरंक्षण कर रहे व्यक्तियों के पारदर्शिता से चुनाव किये जाने से ज़िले, राज्य और राष्ट्र में इसका व्यापक प्रभाव दिख पायेगा।

शिक्षा व्यवसाय नहीं अपितु जीवन ध्येय है। शिक्षक के चरित्र, ज्ञान व प्रतिबद्धता से ही छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं चरित्र निर्माण संभव है। शिक्षक में चार तरह की प्रतिबद्धता अतिआवश्यक है-

पहला- छात्रों के प्रति प्रतिबद्धता- यहां पाठ्यक्रम के विषयों को रोचक बनाना, छात्रों में मूल्य बोध कराना, साथ ही साथ छात्रों के जीवन को दिशा दिये जाने प्रथम प्रतिबद्धता है।

दूसरा- शिक्षक का विषय के प्रति प्रतिबद्धता- विषय पर नियंत्रण व प्रभावी ढंग से अभिव्यक्ति, साथ ही साथ नियमित अभ्यास अनिवार्य रूप से छात्रों को कराया जाना दूसरी प्रतिबद्धता के अंतर्गत आती है।

तीसरा- समाज के प्रति प्रतिबद्धता- शिक्षक को विद्यालय, महाविद्यालय एवं यूनिवर्सिटी के छात्रों में सामाजिक जागरूकता, चेतना, संवेदना जगाने एवं उसमें राष्ट्र भक्ति के संस्कार देने के संभावित प्रयास किये जाने चाहिए।

चौथा- स्वयं के प्रति प्रतिबद्धता- शिक्षा देना व्यवसाय नही, अपितु ध्येय है। शिक्षा देना यह मनुष्य के निर्माण का कार्य है।

उपरोक्त चार तरह की प्रतिबद्धता से छात्रों के व्यक्तित्व का समग्र, सर्वांगीण एवं चहुमुँखीं विकास की जा सकती है। शिक्षक अगर ज्ञानवान, प्रखर, ओज वान, कौशल विकास में निपुण, अभिप्रेरणात्मक स्तर बढ़ाने में निपुण, प्रतिस्पर्धात्मक चुनौती से छात्रों का सामना करवाने में निपुण होंगे, तो छात्रों के परिष्कृत व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन कर पाएंगे। जैसे शिक्षक होंगे, वैसे समाज का सृजन होता दिखेगा।

चिन्तन – ०३

सुप्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, हर्षोल्लास में व्यतीत हो।

देश की आजादी सही मायने में तभी चरितार्थ हो सकती है जब देश मे लिंग भेद के नाम पर वर्गीकरण न हो, महिलाओं, बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो व सम्मान मिले, शिक्षा व आजादी मिले। जीवन की दिशा तय करने का अधिकार मिले, अपने रुचि के मुताबिक अपने कैरियर को संवारने का मौका मिले, आजाद भारत में किसी भी महिला/बच्चों को अपना कैरियर चुनने का अधिकार भारतीय संविधान के मूल में वर्णित है जिस पर सारगर्भित अमल की जा सके। जीवन में महिलाएं / बच्चे इतना सक्षम बनें की अपनी जिंदगी की जरूरतों को खुद पूरा कर सकें, परजीवी प्रवृति त्यागकर आत्मनिर्भर, स्वाबलंबन की ओर उन्मुख हों।

महिलाएं/बच्चे इसके लिये माता-पिता, परिवार पर आश्रित न रहें, बल्कि अपना खुद का अस्तित्व बनायें। किसी के ऊपर आश्रित रहने से जरूरतें पूरी होती हैं, सपने नहीं। जीवन का आत्मस्वाभिमान सपनों को पंख दिये जाने में निहित है। खुद के सपनों को साकार बनाने के लिये पतंग की डोर अपने हाथों में रखनी जरूरी है। 21 वी सदी में महिलाओं, बच्चों को पितृसत्तात्मक व्यवस्था से निकलकर खुद आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख होने पर बल दिये जाने की जरूरत है, ताकि भारत उन्नति के बहुआयामी आयाम को छू पायें।

जिस देश की महिलाएं, बहनें, पत्नियाँ, माँ, बच्चे ताकतवर होंगे, वह देश समृद्धता की ओर उन्मुख होगा, अतुल्यता की ओर बढ़ेगा। देश के संविधान में लिंग भेद के नाम पर असमानता को दूर किये जाने पर बल, भातृत्व भावना को प्रबल किये जाने पर जोर, विश्व बंधुत्व की भावना पर बल आदि को तवज्जो दिये जाने की जरूरत है। किसी देश की संविधान से वहाँ के नागरिकजनों को मार्गदर्शन प्राप्त होता है।  जय हिंद, जय भारत।

चिन्तन – ०२

शुभ प्रभात , आज का दिन मंगलमय और हर्षोल्लास में व्यतीत हो। जीवन की सार्थकता मौलिक चिंतन, सर्जनात्मक अभिव्यक्ति , निष्काम कर्म, सत्यग्राही , श्रमशीलता, सद्व्यवहार, शालीनता, उदारता, ईमानदारी, सच्चरित्रता, न्यायनिष्ठ, कर्तव्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, आध्यात्मिक चिंतन, अन्तःकरण की शुद्धता आदि में निहित है। उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तव्य की एक परिष्कृत जीवन पद्धति है जिसे आत्मसात करने पर व्यक्ति के भीतर आत्म संतोष और बाहर सम्मान प्राप्त होता है। वेदों में, आत्मा के परिष्कृत स्तर को परमात्मा की संज्ञा दी गयी है और उत्कृष्टता से भरा पूरा अन्तःकरण ही ब्रह्मलोक है। विवेकानंद का एक विचार दिल में आह्लादन की स्थिति लता है जो “कोई भी समाज अपराधियों की सक्रियता की वजह से गर्त में नही जाता, बल्कि अच्छे लोगों की निष्क्रियता इसकी वजह होती है।” निडर बनें, कुछ प्रतिबद्ध लोग ही देश के लिये भलाई का कार्य कर सकते हैं।

इंसान के अंदर नैसर्गिक गुण- ममत्व, वात्सल्य, परानुभूति, कोमल हृदय, सच्चरित्र, बौद्धिक चातुर्य, निर्णय लेने की छमता, मर्यादा को पालन करने वाला, अपनी परिसीमाओं को समझने वाला, कुशल व्यवहार, परोपकारी, समाज के लिये लोकोपयोगी आदि हैं। इन नैसर्गिक गुणों से निर्मित व्यक्ति समाज के सृजनात्मक कार्यों में अपनी अद्वितीय भूमिका का निर्वहन करते हैं। व्यक्ति के किये गये कर्म से ही इंसानी स्वभाव या पशु अथवा दानव प्रवृति का बोध कराती है।

नेतृत्व के नैसर्गिक गुण जन्मजात होते हैं, इसे अर्जित नहीं किया जाता है। मनोवैज्ञानिको ने नेतृत्व के शीलगुण (Traits) सिद्धांत में इस संप्रत्यय की पुष्टि की है। मार्टिन लूथर किंग, महात्मा गाँधी, हिटलर, नेपोलियन आदि कई जन्मजात नेतृत्व योग्यता वाले व्यक्तियों को हम याद करते हैं। नेतृत्व के शीलगुणों में व्यक्ति के शारीरिक गुण- ऊँचाई, वजन, स्फूर्ति व अच्छा स्वास्थ्य /व्यक्तित्व शीलगुणों में- बुद्धि, आत्मविश्वास, शब्दाडंबर, प्रभुत्व, समायोजन, सामाजिकता, परिश्रम प्रियता, कल्पना व दूरदर्शिता, चमत्कार, संकल्प शक्ति/ईमानदार / अच्छा चरित्र / कर्मठ व निष्ठावान / प्रजातांत्रिक शैली से कार्य / कार्य उन्मुखी / समूह उन्मुखी / सहनशीलता / धैर्यवान / निर्भीक आदि होते हैं। नेतृत्व की कुशलता से ही समाज में परिवर्तन की अपेक्षा की जा सकती है।

चिन्तन – ०१

शुभ प्रभात, आज का दिन मंगलमय हो एवं उमंग, सार्थक चिंतन, आत्मोत्थान की ओर अग्रसर एवं हर्षोल्लास मे व्यतीत हो।

आज का विषय : शिक्षा

अनुशासन, ईमानदारी, विवेक, विनम्रता, त्याग, शिष्टाचार, सत्यता, सदाचार, सच्चरित्र, परानुभूति, मिर्दुभाषी, कोमल ह्रदय, धैर्यवान, कर्तव्यनिष्ठ, कुशल नेतृत्व संचालन आदि शीलगुणों ( Traits ) सरीखे संस्कार, मूल्याधारित शिक्षा में अनिवार्य रूप से लागू की जानी चाहिए। मूल्याधारित नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रमों में अनिवार्य रूप से क्रियान्वित किया जाना चाहिए, जो व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिये अनिवार्य घटक सिद्ध होगा।

ऐसे संस्कार निर्मित किये जाने से व्यक्ति के आत्मशक्ति को उन्नत किया जा सकता है। शैशवावस्था में बच्चों का मन कोरा कागज की तरह होता है, परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला है, यह समाजीकरण का प्रथम स्तर है, जहाँ अभिभावक व अन्य पारिवारिक सदस्यों का आचरण आदर्श-उदत्त भावना से परिपूर्ण होने चाहिए। मूल्यपरक शिक्षा के प्रति सकारात्मक नजरिया राष्ट्रीय प्रगति के लिये आवश्यक सोपान है। समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ाने के हरसंभव प्रयास किये जाने चाहिये।

आजकल नैतिक मूल्यों में (अवमूल्यन) कमी, एकल परिवारों (Nuclear Family) का चलन, समाजीकरण (Socialization) की शुद्ध प्रक्रिया का अभाव, भौतिकवादी उपयोग में बढ़ावा, परिवार में विघटन की स्थिति, कर्तव्यनिष्ठ न होना, घर का दोषपूर्ण वातावरण, आनुवंशिक दोष आदि के चलते नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन दिख रहा है। एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिये नैतिक शिक्षा को संपूर्ण राष्ट्र के सभी Education Institutions (शैक्षणिक संस्थानों) में अनिवार्य रूप से लागू किये जाने पर बल दिया जाना चाहिये, ताकि आध्यात्मिक प्रखरता का अद्यतन विकास हो पाये। संतुलित व्यक्तित्व के लिये व्यक्ति मे IQ (Intelligence Quotient) (बुद्धि-लब्धि), EQ (Emotional Quotient) (भावनात्मक-लब्धि) एवं SQ (Spiritual Quotient) (आध्यात्मिक-लब्धि) तीनों गुणों का संतुलित समन्वय होना जरूरी है।

बच्चों में मोबाइल का बढ़ता उपयोग एवं इसके दुष्परिणाम – डॉ. प्रभाकर कुमार

आज का समय भौतिकवादी, आपसी प्रतिस्पर्धा का, सामाजिक चकाचौंध की एवं सूचना प्रौद्योगिकी का बढ़ना व सहज रूप से मिलना, इंटरनेट सर्वसुलभ होना और कम पैसों में 4G की सुविधा मिल पाना है। बच्चों में अनुकरण करने की प्रवृति अत्यधिक होती है, बच्चे अपने घरों एवं माता पिता के व्यवहारों का अनुकरण कर रहे हैं। आज के माता पिता की शिक्षा व संस्कार ही मर्यादित नहीं रह गए हैं तो हम बच्चों को कितना संस्कारवान बना सकते हैं। बच्चों में मोबाइल की लत घर के संस्कारों से आ रहे हैं। साथ ही घर के वातावरण से जब बच्चे स्कूल या महाविद्यालय जा रहे हैं तो अपने संगी साथियों का प्रभाव एवं उनसे यह उपकरण के प्रयोगों को सीख रहे हैं। कुछ बच्चे घर में माता पिता की नजर से बचकर उनकी मोबाइल पर हाथ साफ कर रहे हैं। बच्चों का बाल मन ऐसा होता है कि वह जल्द ही गुमराह होते या गलत चीजों की आदत जल्द सीखते हैं। मोबाइल की माता पिता की लत बच्चों में स्थानांतरित होना, घर में बच्चों को खेल खेल में मोबाइल हाथ मे दिया जाना, कहीं न कहीं प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी ही कर जाता है।

मोबाइल प्रयुक्त करने की आदत आज के समय अपने उच्चतम स्तर पर है। आजकल बच्चों की शारीरीक अवस्था में बदलाव के चलते तथा बच्चों में यौन जानकारी के प्रति उत्सुकता के कारण भी बच्चे मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग कर रहे हैं। पोर्न साइट पर आसानी से जा रहे हैं, नशे सेवन के लिये एडवांस तरीकों को बच्चे मोबाइल इंटरनेट के सहारे आसानी से सीख पा रहे हैं । बच्चों में आज महंगे एंड्रॉयड मोबाइल सेट अपने पास रखने का क्रेज बढ़ा है। माता पिता से जिद करके वह महंगे मोबाइल की खरीद कर रहे हैं। हालांकि बच्चों का बिना मोबाइल फ़ोन के भी काम हो सकता है। पर आज के समय में बच्चों की जिज्ञासा मोबाइल फोन की ओर उन्मुख है।

दुष्परिणाम- समय से पहले परिपक्व हो रहे हैं, आसानी से इंटरनेट का उपयोग, सारी वर्जनाओं को पार कर पोर्न साइट व यौन सामग्री की खोज में समय व्यतीत करना, पढ़ाई में मन न लगा पाना, एकाग्रता की कमी, आंखों की समस्या, शारीरिक गतिविधि का अभाव, बच्चों का बौद्धिक विकास गलत रास्ते की ओर उन्मुख, समाजीकरण की प्रक्रिया अवरुद्ध, बच्चे एकांत की तलाश करते है ताकि मोबाइल पर अनावश्यक चीजों की सर्फिंग कर पाएं, माता पिता से झूठ बोलने की आदत मे वृद्धि, गलत संगति, समय का दुरुपयोग करना आदि। बच्चों में मोबाइल की आदत- जब बच्चे को मोबाइल की आदत लग जाती है और मोबाइल की सुविधा मिल नही पाती तो चोरी, दूसरे की मोबाइल लेना, इसी में हत्या कर देना। बच्चों में id (“इड” एक मनोवैज्ञानिक शब्दावली, जिसका अर्थ है “दिमाग का वह हिस्सा जिसमें सहज ही आवेग और प्राथमिक प्रक्रियाएं प्रकट होती हैं”. “id”: is a PSYCHOANALYSIS term which means “the part of the mind in which innate instinctive impulses and primary processes are manifest.”) अर्थात बच्चे सिर्फ व सिर्फ अपनी आवश्यकता की पूर्ति चाहते हैं उन्हें वास्तविकता से कोई लेना देना नही होता है। इस लिये बाल मन कोई घृणित कार्य करके भी आवश्यकता की पूर्ति कर जाता है।