झारखण्ड राज्य में ग्राम सभा सशक्तिकरण : एक सुझाव

झारखण्ड राज्य स्थापना के 17 साल बीतने एवं वर्ष 2010 से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू हो जाने के बाद भी ग्राम सभा के सशक्तिकरण का कार्य राज सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है. शोध एवं अध्ययन बताते हैं कि आम तौर पर ग्राम सभाओं में गणपूर्त्ति (ग्राम सभा के कुल सदस्यों का 1/10 भाग जिसमें 33% महिला सदस्य का होना जरुरी) नहीं हो पाती है. ग्राम सभा में भागीदारी के प्रमाण स्वरुप घर-घर जा कर ग्राम सभा सदस्यों से ग्राम सभा पंजी में हस्ताक्षर लिए जाने की अदभुत परंपरा विकसित होते जा रही है. जो पंचायती राज व्यवस्था के सारतत्व को ही कुप्रभावित कर जाती है.

 यह सर्वविदित है कि ग्राम सभा में ही विकास की सम्पूर्ण योजनायें परिकल्पित एवं रेखांकित होती हैं, एवं तदनुसार पारित प्रस्तावों के आधार पर कार्यरूप में आती हैं. अतः ग्राम सभा में ग्राम सभा सदस्यों की समुचित भागीदारी एवं उसकी कार्यवाही में पूर्ण पारदर्शिता का होना नितांत आवश्यक है और ऐसा सुनिश्चित कर ही हम ग्राम सभा को सशक्त एवं पंचायती राज व्यवस्था के मूल तत्व को अक्षुण्ण रख सकते हैं.

 इस सन्दर्भ में निम्नांकित सुझावों पर अमल करके हम ग्राम सभा को सशक्त कर सकते हैं-

 सर्वप्रथम, ग्राम सभा आयोजन की तिथि समय एवं स्थान की सूचना देने से सम्बंधित तंत्र को मजबूत करना होगा. सूचना दिए जाने हेतु उपयोग में लायी जाने वाली सामग्रियों यथा- ध्वनि विस्तारक यंत्र, ढोल, हैण्ड-बिल, पोस्टर आदि का प्रयोग समुचित तरीके से किया जाना आवश्यक है. इतना ही नहीं आज अधिकांश ग्राम पंचायतें इन्टरनेट सेवा से जुड़ी हैं. फलतः ग्राम सेवा के प्रचार प्रसार हेतु सोशल साइट्स का उपयोग भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा. इस हेतु प्रत्येक ग्राम पंचायत का फेसबुक पर अपना एक पेज होना जरुरी है, जिससे ग्राम पंचायत के बहुसंख्यक लोग उससे जुड़ कर पंचायतों की क्रियाविधि से अपने को संगत रख सकेंगे.

 दूसरे, ग्राम सभा की सूचना देते समय ग्राम सभा में चर्चा किये जाने वाले मुख्य एजेंडों को प्रचारित किया जाना चाहिए. ऐसा किये जाने से विषयों से सम्बंधित हितग्राही व्यक्ति अपने अन्य कार्यों के ऊपर ग्राम सभा में भाग लेने के कार्य को प्राथमिकता दे सकेंगे एवं परिणास्वरूप ग्राम सभा में सदस्यों की भागीदारी बढ़ेगी.

 तीसरे, ग्राम सभा स्थल भी ग्राम सभा के सदस्यों की भागीदारी को प्रभावित करता है. फलतः सभा स्थल के चयन में पूर्ण सतर्कता एवं गंभीरता बरतनी चाहिए. सभा स्थल का सुरक्षित होना एवं सदस्यों के द्वारा जरुरत पर उपयोग हेतु पेयजल के साथ-साथ महिला-पुरुषों द्वारा उपयोग किये जाने वाले पृथक शौचालयों से युक्त स्थान/भवन श्रेयस्कर माना जाता है.

 चौथे, ग्राम सभा की बैठक आरंभ करने से ठीक पहले, यदि उस ग्राम में पिछली बैठक और वर्तमान बैठक के अन्तराल में कोई असह्य दुर्घटना घटी हो तो उस सन्दर्भ में उस घटना के प्रति शोक संवेदना व्यक्त किया जाना व्यावहारिक प्रतीत होता है. ऐसा किये जाने से लोगों का आपस में संवेदनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ सरकारी तंत्र के संवेदनशील एवं मित्रवत होने का जीवंत साक्ष्य मिल सकेगा और वे ग्राम सभा में अपनी-अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने में ज्यादा सहज महसूस कर सकेंगे.

 पांचवें, प्रत्येक ग्राम सभा की शुरुआत एक प्रेरक गीत से की जानी चाहिए जिसमें सामुदायिक गीत की प्रधानता के साथ-साथ अभिवंचित परिवारों के लाभ के प्रति जन सामान्य का सहयोगी रवैया प्रतिध्वनित हो.

 छठे, ग्राम सभा में प्रस्तावों पर चर्चोपरांत लिए गए विधिसम्मत निर्णय का दस्तावेजीकरण ग्राम सभा के दौरान ही होने चाहिए. औपचारिक दस्तावेजीकरण का कार्य ग्राम सभा स्थल से हटकर या अन्य दिनों में नहीं किया जाना चाहिए. ग्राम सभा के प्रति लोगों में विश्वास पैदा करने हेतु यह एक आवश्यक तत्व है.

 ग्राम सभा के सशक्तिकरण हेतु सुझाये गए उपर्युक्त उपायों को व्यवहार में लाकर हम ग्राम सभा को वास्तविक स्वरुप प्रदान करने में सफल हो सकेंगे साथ ही ग्राम सभा को एक नया कलेवर दिया जा सकेगा जो किसी न किसी रूप में आम जनों की उत्तरोत्तर सहभागिता के मार्ग को प्रशस्त करता दिखाई देगा.

 राजेश पाठक
सांख्यिकी पर्यवेक्षक
(झारखण्ड सरकार)
9113150917

छठ : स्त्री-पुरुष समानता का अनुपम प्रतीक

हमारे देश में लोक आस्था का महान पर्व छठ वर्ष में दो बार मनाये जाते हैं. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. निरोगी काया, पारिवारिक सुख समृद्धि व मनोवांछित फल प्राप्ति हेतु मनाया जाने वाला यह पर्व स्त्री एवं पुरुष वर्गों द्वारा सामान रूप से मनाया जाता है. यूँ तो अधिकांश पर्वों में स्त्रियों द्वारा ही उपवास एवं व्रत धारण करने की परंपरा रही है, परन्तु छठ पर्व ही एक ऐसा महत्वपूर्ण पर्व है जिसमे समान रूप से स्त्री एवं पुरुष द्वारा व्रत धारण करने की परम्परा रही है, जो किसी न किसी रूप में स्त्री पुरुष की समानता एवं परस्पर निर्भरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है.

इस पर्व में सर्वोच्च आस्था के प्रतीक सूर्य देव की आराधना आतंरिक शक्ति एवं तेज की प्राप्ति हेतु की जाती रही है. सादगी, सफाई एवं निर्विघ्नता इस पर्व के तीन मजबूत कारक हैं जिसे दृष्टिगत रख उपासना की जाती है. गहराई से देखें तो पता चलता है कि इस पर्व का न सिर्फ धार्मिक महत्व है वरन यह लोगों के दिन प्रतिदिन के कार्यव्यवहार में अपनाई जाने वाली सादगी एवं स्वच्छता की अनिवार्यता को भी स्वीकार करता है. यह पर्व सदा सन्देश देते आ रहा है कि हमें स्वच्छता, सादगी व सफाई जैसे मूलभूत मानवीय गुणों को धारण करने में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए. ऐसा कहा भी जाता है कि “स्वच्छता का हो रहा निवास जब, बसता है भगवान और वहीँ पे रब”.

यद्यपि, छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक एवं लोककथाएं प्रचलित हैं जिसमे सूर्य पुत्र कर्ण की लोककथा ज्यादा प्रचलित है. एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में कर्ण द्वारा सूर्य की उपासना के साथ हुई. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने. शक्ति के अनंतिम स्रोत सूर्य को आज भी शक्ति व ऊर्जा का अनंतिम स्रोत माना जाता है एवं उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए समस्त विश्व विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक कार्य व्यवहारों में संग्लग्न रहते आया है.

अब हमें इस सत्य को मानने से इंकार नहीं करना चाहिए कि लोक आस्था से जुड़ा यह महापर्व दिन प्रतिदिन के आचरण में अपनायी जाने वाली महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बनते जा रहा है.

यह समर आज अंतिम होगा

यह समर आज अंतिम होगा
……………………………….
यह समर आज अंतिम होगा

मत सोच कि यह मद्धिम होगा

मिट जाएगा अब सब अंतर

हर भय होगा अब छू-मंतर

हर दिशा आज संवाद करे

हर क्षण हर पल अनुनाद भरे

बिछड़े का होगा आज मिलन

बिन ब्याही बने नहीं दुल्हन

अब नहीं हो रही है हानि

सब दूर हो रही मनमानी

अब हुआ तिरोहित सब शोषण,

हर गांव-गली है अब रोशन

अब हो अमीर या हो गरीब

इक दूजे के होते करीब

जो भ्रष्ट बने सत्ताधारी, सिंहासन अब उनका डोले

जो बन बैठे थे मूक मगर, अब वे भी अपना मुंह खोले

अब अच्छे लोग चुने जाते

वो सबकी आज सुने जाते

अब सब मिलकर सब बाँट रहे

गहरी नींदे, ना खाट रहे

तौलें भी, अब ना बाट रहे

सबकी अब अच्छी ठाट रहे

अब कोई न बंदरबांट करे

सब अपनी-अपनी घाट रहे,

जो सोते आज बिना रोटी उनके घर आज सने आटा

दुःख दर्द भी अब इक दूजे का है मिलकर के सबने बाँटा।

**************
राजेश पाठक
प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखंड

आओ एक दीप जला जाओ!

आओ एक दीप जला जाओ
……………………………….
तुम बनो आज अब उद्दीपक

तुम हो तो जल पाए दीपक

तुम हो तो दूर अंधेरा हो

जगमग प्रकाश से डेरा हो

मैं तुझे ही दीपक मान रहा

तू सदा जले यह ठान रहा

तुझमें घी बाती भरता हूँ

अब हो बयार ना डरता हूँ

तुम मंद – मंद ही जला करो

जलते – जलते भी भला करो

पर कभी – कभी मन डोल रहा

अंदर – अंदर ही बोल रहा

क्यों जले दीप ना हो प्रकाश

क्यों ज़िंदा पर ना चले सांस

यह सब वायु का दोष रहा

जो त्याज्य रहा सब पोस रहा

पहले वायु को शुद्ध करो

हो सके तो उससे युद्ध करो

जब शुद्ध पवन हो जाता है

सब अंधकार खो जाता है

दीपक की आयु बढ जाती

गिरती लौ भी तब चढ जाती

हो अंधकार जितना भी घोर

तब काली रात भी लगे भोर

दीपक की यही कहानी है

यह कर्ण -दधिचि -दानी है

खुद जलकर भी ना जलता है

औरों की तरह ना छलता है

अब हो अमीर या हो गरीब

दीपक -प्रकाश सबके करीब

यह सबके साथ करे प्रीति

है इक समान इसकी ज्योति

यह हर घर जगमग करता है

इसके मन ठग ना रहता है

आओ एक दीप जला जाओ

भारत की शान बढा जाओ.

……………………………….
राजेश कुमार पाठक

प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
सदर प्रखंड, गिरिडीह.

अछूत – ०३

इसके पहले की कहानी पढ़ें:

नजर में असर होता है. नजर टेढ़ी हो, तो उसके अलग और सीधी हो, तो अलग मायने निकल आते हैं.

आपकी टेढ़ी नजरें मुझे भले अछूत मानती हों, पर नजरें सीधी कर दें, तो वहीं मेरा सौम्य चेहरा बरबस आपको अपना ही पुत्र मान लेने का विस्मयकारी एहसास करा जायेगा. जिन सवालों के जवाब खोजे भी नहीं मिलते, अगर उनके जवाब कूड़े-करकटों पर बिखरे पन्नों में मिल जायें, तो उसे लोग छोड़ा नहीं करते. उन्हें यूं सहेज कर रख लेने में कोई परहेज नहीं करते. जो कूड़ों-करकट की परवाह करते हैं, वे अपनी जिंदगी खुद ही तबाह करते हैं. बच्चे को स्कूल आने से मत रोकिये, वह बहुत कोमल है. उस पर अपने विचार मत थोपिए. रूंधे स्वर में प्रधानाध्यापक सुरेश ने कहा.

आपका क्या? प्रधानाध्यापक एक लय में कहे जा रहे थे, आप तो इतने रसूखदार हैं कि सरकार के सहारे मेरा स्थानांतरण इस स्कूल से किसी दूसरे स्कूल जब चाहें करा दें. पर, क्या बच्चों में मेरे प्रति स्वाभाविक रूप से उपजी गुरु भक्ति, अपने शिष्यों के प्रति पैदा हुई मेरी उस आसक्ति को किसी के सहारे मिटा पायेंगे?

शायद नहीं, क्योंकि गुरु भक्ति हो या गुरुओं की शिष्यों के प्रति आसक्ति, इसे कानूनों के मोहताज नहीं बनाये जा सकते. क्या सोचते हैं, प्रधानाध्यापक सुरेश कहे जा रहे थे कि एक अछूत, जो पाठ अपने शिष्यों को पढ़ाते आया है, आपके ही दरवाजे पर आ कर आपको ही पढ़ा गया. नहीं, कदापि नहीं. यह तो वह पाठ है, जिसे आप, हम, हर कोई अपने-अपने बालपन में पढ़ा होता है. कालचक्र के वक्र होते बहुसंख्यक इसे भूल जाते हैं. मैं उसी कालचक्र की वक्रता को सीधा करना चाहता हूं.

बाबूजी! मैं सोचता हूं कि कोई अपने में ही समायी अज्ञानता, अशिक्षा एवं दंभ को अछूत क्यों नहीं मानता? काश! कोई इसे ही अछूत मानता और इस अछूत को भी अपना ही पुत्र जानता. प्रीतम सिंह अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश की बातें इस तरह अवाक् हो सुनता जा रहा था, मानो उसके मुंह से निकली अमृतवाणी उसे आत्मग्लानि का बरबस एहसास करा रही हो.

वह प्रधानाध्यापक के आत्मविश्वास एवं निर्भीकता को देख हतप्रभ था. जब प्रधानाध्यापक ने अचानक बोलना बंद कर दिया, तो प्रीतम सिंह हठात बोल पड़ा- बोलते जाओ. पता नहीं आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मेरा अंतर्मन जाग रहा है. इस जग रहे अंतर्मन को पूरी तरह जगा देना चाहता हूं. कोई इसे भले ठगना कहता हो, तब भी मैं ठगा जाना चाहता हूं. आज मुझे एहसास हो रहा है कि संस्कार किसी जाति का मोहताज नहीं. संस्कार मोहताज भी है, तो प्रधानाध्यापक जैसे दृढ़ निश्चयी, वीर्यवान और शौर्यवान लोगों को, जो निडर हो बेबाक सच्चाई बयां कर जाता हो और लोगों की कोई चाहत न भी हो, तो अच्छाई उनके घर कर जाता हो.

प्रीतम सिंह अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ. उसे लग रहा था मानो वर्षों बाद उसे जीवन के दर्शन हुए. वह अछूत प्रधानाध्यापक को अपना जीवन समझ उसे अपने में आत्मसात कर लेना चाह रहा था. मानो उसके ऐसा नहीं करने से वह जीवन से ही जाता रहेगा. उसने प्रण किया कि आज और अभी से सागर पर उससे कहीं ज्यादा प्रधानाध्यापक का अधिकार है. सागर के जीवन की चिंता करना उसके लिए बेकार है, क्योंकि अब पुत्र तो पुत्र, उसे भी प्रधानाध्यापक के विचारों की अधीनता स्वीकार है.

इन सबों के बीच प्रीतम सिंह की आंखों से बहती प्रायश्चित रूपी अश्रु की धारा अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश की आंखों से बहते स्वाभिमान और विवेक की अश्रुधारा में इस तरह विलीन हो रही थी, मानो नदियां समुद्र में मिल अपनी चिरस्थायी शांति को प्राप्त कर रही हों.

समाप्त.

अछूत – ०२

इससे पहले की कहानी पढ़ें

यह कितना आश्चर्य भरा है कि गंदगी तो सभी पैदा करनेवाले होते हैं, पर कुछ ही होते हैं, जो उस पैदा की गयी गंदगी को स्वयं साफ करते हैं और बहुसंख्यक ऐसे होते हैं, जो उन मजबूर लोगों की तलाश में जुट जाते हैं, जो अपने जीवन अस्तित्व को रखने के लिए उनके द्वारा पैदा की गयी गंदगी को साफ कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता हो.

यह सच है कि प्रधानाध्यापक सोचे जा रहे थे, कि मजबूरियां इनसान को कर्म करने की ओर प्रेरित करती हैं. मेरा तो मानना है कि मजबूरियों से उपजी कर्म की दिशा और दशा चिरकाल तक स्थायी नहीं हो सकती, क्योंकि मजबूरियां मिटते ही कर्म की दिशा बदल जाती है.

मजबूरियां समाज में उच्च जाति एवं वर्ण माने जानेवाले लोगों को भी जूते साफ कर भी धन अर्जन को मजबूर कर देती हैं, तब उस व्यक्ति या परिवार को हम मोची का स्थायी नाम क्यों नहीं दे पाते? क्यों नहीं उनकी जातिगत श्रेष्ठता कर्मगत श्रेष्ठता या निकृष्टता में विलीन हो पाती है? आज मुझे क्यों लोग अछूत कह कर अछूत मान लेना चाहते हैं, जबकि मैं ज्ञान अनुभवों से लोगों के बीच सुसंस्कार बांटता हूं? सच कहूं, तो जाति तो कर्म की दासी है.

कर्म स्थायी हो, तो जाति स्थायी हो सकती है. परंतु, सच यह है कि कर्म स्थायी या समरूप स्वरूपवाला हो ही नहीं सकता. परिस्थितियों का दास बना व्यक्ति एक कर्म से दूसरे कर्म को सदा स्थानांतरित होता रहता है. मुझे नियत कर्म से उपजी वर्ण व्यवस्था को मान लेने में कोई अचरज नहीं, पर तब उनलोगों की जाति, जो अपनी मूल जातिगत कर्मों से विलग हो कर अन्य जातिगत कर्मों में स्वयं को आत्मसात कर अपने जीवन का आधार बना लेते हैं, को धर्म परिवर्तन की तरह जाति परिवर्तन के अधिकारों को क्यों नहीं मान्यता मिली?

सच तो यह है कि कर्म के स्वरूप का वर्गीकरण काल, समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप सदा अस्थायी एवं परिवर्तनशील होता है.

प्रधानाध्यापक के मन में खुद तरह-तरह के सवाल पैदा होते जाते, उनका मस्तिष्क स्वयं उनका हल ढूंढ़ता जा रहा था. बस आवश्यकता इस बात की रह गयी थी कि उसके मस्तिष्क द्वारा ढूंढ़े जा रहे हल को समाज सहजता से मान्यता प्रदान करने में असहज महसूस नहीं करता, परंतु समाज को इस पारंपरिक मान्यताओं की वर्जनाओं से मुक्ति प्रदान करना उतना भी सहज नहीं था और यह भी सच था कि प्रधानाध्यापक भी हार माननेवालों में से नहीं थे. वह उस व्यक्ति के दंभ, अहंकार, कुंठाधारित अस्त्रों से उसे ही घायल कर उस पर अपने विवेक एवं चातुर्य का मरहम लगा कर सदा के लिए उसे इस रोग से मुक्त कर देना चाहते थे.

वह बच्चों में घर करते जा रहे सुसंस्कारों के हथियार से उसके ही अभिभावकों में जातिगत दंभ और अहंकार के शत्रु का विनाश कर देना चाहते थे, जो किसी न किसी रूप में बच्चों के व्यक्तित्व के समुचित विकास को बंधक बना रखा हो.

धीरे-धीरे सभी बच्चों ने प्रधानाध्यापक से प्राप्त शिक्षा को व्यावहारिक जीवन में उतारना शुरू कर दिया था. अपने ही माता-पिता व वरिष्ठ लोगों द्वारा समाज-परिवार में बरती जानेवाली विसंगतियों के प्रति विरोध जताना शुरू कर दिया था. उच्च जाति के बच्चे निडर हो अपने से निम्न जाति के बच्चों के साथ खुल कर मिलना, उनके घर आना-जाना बेरोकटोक शुरू कर दिया था. निम्न जाति के टोलों में बसे बच्चों के साथ हृदयंगम होने लगे थे. ऊंच-नीच के भेदभाव की दीवार बच्चों के बीच बालू की भीत की तरह ढहते जा रहे थे.

यह सब उच्च जाति के अधिकतर लोगों को नागवार लग रहा था. उन लोगों ने अपने बच्चों को गांव के इस स्कूल में नहीं पढ़ाने की योजना बनानी शुरू कर दी थी. इसी योजना के तहत सर्वप्रथम उनलोगों ने यह तय किया कि इस गांव के प्रीतम सिंह, जिसे जाति एवं धन दोनों ही दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, अपने बच्चे सागर को स्कूल भेजना बंद करें. प्रीतम सिंह ने लोगों की बात मान कर सागर को स्कूल जाने से मना कर दिया. सागर के स्कूल नहीं गये कुछ दिन गुजर चुके थे. तब अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश ने फैसला किया कि क्यों नहीं सागर के इस तरह अचानक स्कूल न आने की सुधि लें.

उस पर सागर जैसा लड़का, जो धीर-गंभीर स्वभाव का होने के साथ-साथ कम उम्र में ही जीवन-दर्शन को आत्मसात कर लेनेवाला था. प्रधानाध्यापक को रहा नहीं गया. वह प्रत्येक शनिवार की शाम स्कूल बंद होने पर अपने घर जाया करते थे, पर इस शनिवार को उन्होंने अपने घर न जा कर सागर के घर उसकी खोज-खबर लेने का मन बना लिया. एक राहगीर की मदद से प्रधानाध्यापक सागर का घर आसानी से ढूंढ़ कर पहुंच गये. उसके घर से सटा एक दालान था, जिसमें से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आ रही थी. प्रधानाध्यापक ने दालान पर पहुंच कर दोनों हाथ जोड़े अपना परिचय देते हुए सागर से मिलने की बात कही.

‘क्या तुम सागर से ही मिलना चाहते हो? मुझसे नहीं मिलोगे? मैं सागर का बाप हूं, प्रीतम सिंह ने बड़े ही रौब में आ कर कहा- अहो भाग्य! आपके दर्शन हुए, प्रधानाध्यापक सुरेश ने कहा- क्या मुझे बैठने को नहीं कहेंगे? प्रधानाध्यापक ने आत्मविश्वास के साथ पूछा. कोई कुरसी अगर खाली पड़ी हो, तो बैठ जाओ, वरना तुम्हारी दो-चार फिजुल बातों को भी सुनने का वक्त फिलहाल मेरे पास नहीं है, प्रीतम सिंह ने घमंड के साथ कहा. प्रीतम सिंह तो ऐसे अवसर की तलाश में था ही, जबकि वह अछूत शिक्षक का मान-मर्दन करे.

उसे लगा मानो वह अवसर उसे आज मिल ही गया. वह इस आये अवसर को गंवाना नहीं चाहता था. कुरसियां खाली न होने से प्रधानाध्यापक ने खड़े-खड़े ही बिना देर किये सागर के कुछ दिनों से स्कूल नहीं आने की वजह जाननी चाही. सागर मेरा बेटा है. उसे स्कूल भेजूं या ना भेजूं, तुझे तकलीफ क्यों? प्रीतम सिंह ने बड़ी हेकड़ी के साथ कहा. सागर सिर्फ और सिर्फ आपका बेटा है, यह आपने कैसे मान लिया? प्रधानाध्यापक सुरेश ने प्रत्युत्तर में कहा.

और नहीं तो क्या, वह तुझ जैसे अछूत का बेटा है? प्रीतम सिंह ने अकड़ कर अपनी बात कह डाली. बस बाबूजी बस! बहुत हो गया. आप भ्रम में थे कि मैं सागर से मिलने आया था.

मुझे तो सागर पहले ही आपके बारे में, आपकी सोच के बारे में बता चुका था. सच तो यह है कि मैं आपसे ही मिलना चाह रहा था. मैं जानता हूं, मुझे सागर ने स्कूल नहीं आने की वजह पहले ही बता दी थी. उसकी गुरु भक्ति आपको इसलिए रास नहीं आयी कि मैं अछूत हूं. सच कहा आपने. भला एक अछूत जाति का आदमी उच्च संस्कारों की बात सोच भी कैसे सकता है? जो चीथड़ों और गुदड़ियों में पलता हो, भला मखमलों का एहसास उसे कैसे हो? पर, यह मत भूलिए कि कोई व्यक्ति महान तब होता है, जब दूसरों का अपमान न कर, उसके स्वाभिमान की रक्षा करता है और यह सब आपमें दिखायी देता है. मैं आपमें वह सब देख पा रहा हूं, जिसे आप चाह कर भी नहीं देख पा रहे. आखिर ऐसा क्यों?

इसके आगे की कहानी पढ़े अगले पोस्ट में.

अछूत – ०१

गाँव के कुछ लोग रमेश के पिता के बारे में जानने के इच्छुक रहते थे, उन्हें पता था कि जब से वे गाँव के स्कूल से स्थानांतरित हो, दूर शहर के स्कूल में चले गए हैं, तब से ही गाँव के स्कूलों में शिक्षा की स्थिति उतनी अच्छी नहीं रह गयी थी. उनलोगों की अब भी चाहत थी कि वे शहर से स्थानांतरित हो, अपने गाँव के स्कूल में आ जाते. लेकिन, सच्चाई यह थी कि सरकारी नियमो के अनुसार वे अपने गाँव के में शिक्षक बन कार्य नहीं कर सकते थे.

गाँव के लोग सोचते थे कि उनके जाने के बाद एक निम्न जाति का शिक्षक इस गाँव के इकलौते स्कूल का जब से प्रधानाध्यापक बन कर आया है, तब से मानो स्कूल की शिक्षा व्यवस्था ही चौपट हो गई हो, परन्तु सच्चाई ऐसी नहीं थी. उस नए प्रधानाध्यापक सुरेश के आने से बच्चे स्कूल में और भी अनुशासित हो विद्या अध्ययन करते और सुसंस्कृत हो रहे थे. सभी बच्चे ज्योंही विद्यालय के मुख्य द्वार पर पहुंचते, उस मुख्य द्वार को विद्या का मंदिर समझ अपना मस्तक टेक कर प्रवेश करते और फिर अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थान ग्रहण कर लेते.

प्रत्येक दिन प्रधानाध्यापक इस एक शिक्षकीय विद्यालय में विषय से संबंधित पाठ्य सामग्रियों की पढ़ाई के दौरान थोड़ा वक्त निकाल कर व्यवहार कुशलता एवं नैतिकता का पाठ बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. बच्चे भी सर्वस्व न्योछावर कर गुरु भक्ति में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते. उन्हें मां-बाप का प्यार भी मानो शिक्षकों से सहजता से मिल जाता था. सभी बच्चे ऊंच-नीच, छोटा-बड़ा, जाति-धर्म जैसे भेदभावों से बहुत ही ऊपर उठ कर मानव धर्म के गुणों का वरण कर रहे थे. उन्हें विद्यालय में रह कर स्वर्गिक और दैविक अनुभूति प्राप्त हो रही थी.

गांव के कुछ संकीर्ण व जमींदार मानसिकतावाले घराने के लोगों को विद्यालय के अछूत प्रधानाध्यापक की लोकप्रियता एवं स्कूली बच्चों का उसके प्रति समर्पण भाव रास नहीं आ रहा था. उन्हें निम्न जाति के प्रधानाध्यापक के प्रति बच्चों में विकसित होते जा रही गुरु भक्ति सर्वदा सालती रहती. वे स्कूल के प्रधानाध्यापक के विरुद्ध गांव के अन्य लोगों को भड़काने एवं जलील करने की मोहलत की तलाश में रहते. परंतु, प्रधानाध्यापक पूरी तन्मयता से बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगाते, अंदर ही अंदर आत्मिक सुखों के सागर में बिना डगमगाये, अपनी नैया को खेते जा रहे थे.

विद्यालय के सभी बच्चे प्रधानाध्यापक द्वारा दी गयी शिक्षा के अनुसार सुबह उठते अपने मां-बाप के चरण स्पर्श कर पूरे आत्मविश्वास के साथ दिनचर्या शुरू करते. बच्चों में आये इस परिवर्तन को कुछ अभिभावक अपना सौभाग्य, तो कुछ संकीर्ण विचारधारा के उच्च जाति के लोग नये शिक्षक अछूत प्रधानाध्यापक की सोची-समझी दूरगामी रणनीति का हिस्सा समझते. उन्हें अपने बच्चों में आ रहे सुसंस्कृत परिवर्तन के बजाय प्रधानाध्यापक के प्रति बच्चों की अतिशय गुरु भक्ति एवं गुरु वचनों के सम्मान की चिंता सताती. उस गांव के कुछ प्रबुद्ध लोग, सुरेश के अछूत जाति का होने पर भी उसके अंदर की विलक्षण प्रतिभा के प्रति यह सोच, मन ही मन प्रसन्न होते कि उनके बच्चे सुसंस्कृत हो, जीवन के असली मूल्यों के करीब होते जा रहे थे.

परंतु, ऐसे अभिभावकों की संख्या नगण्य थी. वे भी गांव के बाहुबली व उच्च जाति के घरानों के बीच अछूत प्रधानाध्यापक के गुणों का बखान खुलेआम करने में जी चुराते थे. उन्हें अंदर ही अंदर डर रहता था कि कहीं वे अपने रसूख के बल पर उन्हें समाज से बहिष्कृत न कर दें. गांव के रसूखदार माने जानेवाले उच्च जाति के कुछ लोगों ने मिल कर एक योजना बनायी कि क्यों नहीं प्रधानाध्यापक को इतना जलील किया जाये कि वह स्वयं इस गांव के विद्यालय से अपना स्थानांतरण कहीं अन्यत्र करा ले.

इन दिनों सरकार द्वारा भी स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा था. सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक स्थानों, गली-मुहल्लों आदि में पसरे कूड़े-करकट, गंदगी आदि की साफ-सफाई करना मानो एक प्रचलन-सा बन गया था. प्रधानाध्यापक ने भी सभी स्कूली बच्चों को अगले रविवार की छुट्टी के दिन टीम बना कर अपने नेतृत्व में स्कूल और गांव की बजबजाती, गंदी नालियों को साफ करने का ठान रखा था. इसके लिए उसने सभी आवश्यक तैयारियां कर रखी थी. योजनानुसार, रविवार को स्वच्छता अभियान में सारे बच्चे जुट गये.

इस अभियान में कुछ वरिष्ठ बच्चों को टीम का लीडर बनाया गया था, परंतु उस संपूर्ण अभियान की पूरी देख-रेख स्वयं प्रधानाध्यापक कर रहे थे. सुबह से लेकर शाम तक पूरे गांव-मुहल्लों की गलियां गंदगी से मुक्त हो गयी थीं. प्रधानाध्यापक अपने विद्यार्थियों के साथ जब गांव के एक रसूखदार के घर की ओर जाती गलियों की गंदगी को साफ कर रहे थे, उसी समय एक व्यक्ति की घमंड से युक्त वाणी को सुन कर ठिठक गये. ‘‘बच्चों थोड़ा रुक जाओ.

अपने कोमल हाथों से इस तरह गंदगी उठाना शोभा नहीं देता. और तो और, तुम्हें तो गंदगी साफ करने की न तो आदत है, न ही अनुभव. तुम्हें नहीं मालूम कि तेरा गुरु उस जाति से ताल्लुक रखता है, जो समाज में हमारे-तुम्हारे द्वारा त्याज्य गंदगियां चिरकाल से साफ करते आया है. इनके रहते तुम जैसे अनुभवहीन बच्चों से इस तरह गंदगी बिल्कुल ही साफ नहीं हो सकती.’’ यह कहते हुए उस व्यक्ति ने अपने घर की कुदाल प्रधानाध्यापक को थमा दी. प्रधानाध्यापक स्थिर चित्त एवं गंभीर स्वभाव के थे.

उन्होंने उस व्यक्ति के जातिगत अहंकार एवं कुंठा को सहजता से भांप लिया. बच्चों को उस व्यक्ति के वचनों का भावार्थ समझाना उन्होंने उचित नहीं समझा. उधर, सफाई अभियान सफलतापूर्वक पूरा करने का भी दायित्व प्रधानाध्यापक पर ही था. परंतु, प्रधानाध्यापक के मन का समुद्र सदा उस व्यक्ति के वचनों से हिचकोले मारता रहा कि ज्ञान-विज्ञान इतना ऊंचा है, विश्व के सभी प्राणी वैज्ञानिक चमत्कार से एक-दूसरे के इतने करीब एवं परस्पर निर्भर हैं, फिर भी लोग संकीर्ण जातिगत हितों एवं उसकी श्रेष्ठता का राग अलापना क्यों नहीं छोड़ते? जीवन क्षणभंगुर है, यह तो सब जानते हैं पर अपने हितों की बात पूरी करनी हो, तो उन्हें अपना जीवन अनंतकाल तक टिकनेवाला अनुभव क्यों लगता है.

माना कि मैं अछूत हूं. त्याज्य हूं, पर मुझे अछूत बनाया किसने?

इसके आगे की कहानी अगले पोस्ट में पढ़ें

वाह रे कैसी है सरकार

| | वाह रे कैसी है सरकार | |

रोज उखड़ती पटरी है

पर बुलेट ट्रेन तैयार,

वाह रे कैसी है सरकार,

डीजल-पेट्रोल लेने जाओ,

बढे दाम हर बार

वाह रे कैसी है सरकार,

घर से निकलो बाहर देखो

पता चलेगा यार,

वाह रे कैसी है सरकार,

मोदी को सोम को बुध कहे तो

कहते सभी बुधवार

वाह रे कैसी है सरकार,

अब विपक्ष कमजोर पड़ा है,

सुनु नहीं ललकार

वाह रे कैसी है सरकार,

रहे दवा पर मिले नहीं

सब दवा हुआ एक्सपायर

वाह रे कैसी है सरकार,

काम नहीं मिलता हो जब

तब उठा न ले हथियार

वाह रे कैसी है सरकार,

उचित दाम ना काम का मिलता

छोड़ रहा घर बार

वाह रे कैसी है सरकार,

कल नेता झोपड़ियों में थे

महल हुआ तैयार.

वाह रे कैसी है सरकार,

काम करे इक बार मगर

कहे उसे सौ बार

वाह रे कैसी है सरकार,

 

 

वीर

|| वीर ||

नमन करो उन वीरों को जो लौट कभी ना आये |
आँखों में सपनों के आंसू ले कर दीप जलाएं ||

चलो फिर आज कहता हूँ, कहानी मैं जवानों की|
कहानी है यही इनकी, कहानी जो दीवानों की||
कहर बनकर के जा टूटे, जो इनपे वार करता है|
अगर दुश्मन झुकाए सर, तो उनसे प्यार करता है||

कहानी और भी इनकी सुनाने आज आया हूँ |
मेरे सीने में जो दिल है लुटाने आज आया हूँ ||
लुटाऊं आज मैं सब कुछ बढाऊं हौसले हरदम |
रहे जो फासले अबतक हुए वो फासले भी कम ||

दिखाई सरफरोशी दे तुम्हारी है यही दौलत |
दिखे दुश्मन तू देता है, नहीं थोरी सी भी मोहलत ||
तेरे अंदाज से दुश्मन को पानी भी नहीं मिलता |
हिला देते हमेशा तुम, हिलाए जो नहीं हिलता ||

अपने हाथ से ही अपनी तू तक़दीर लिख डालो |
कोई न गीत गता हो, अपना गीत खुद गा लो ||
कोई जब मांग बैठे तो, न अपना गीत लौटना |
छिड़े जब जंग दुश्मन से, हमेशा जीत कर आना ||

तुझे कहता है जो शीशा, उसे कहने दो तुम शीशा |
उसे मालूम ना है कि, तेरा शीशा भी है कैसा ||
तेरे दम से ही तो अब आज, सब गम दूर होता है |
चले शीशे पे जो पत्थर वो पत्थर चूर होता है ||

निशाँ कदमो के तेरे हों वहां तक दिख रहा भारत |
बढाओ आज क़दमों को, लिखो न आज कोई ख़त ||
मैं चाहूं नाप लो धरती, जो कब्जे में हैं दुश्मन के |
नहीं तो आज जा कह दो, रहें भारत के ही बनके ||

राजेश पाठक
प्रखण्ड सांख्यिकी पर्यवेक्षक
गिरिडीह सदर प्रखण्ड.

कविता सुनने के लिए क्लिक करें

पुनर्जन्म

श्रीधर सरकारी सेवा में रहते हुए भी भ्रष्ट सरकारी सेवकों के कुप्रभावों से अपने को दूर रखकर बड़ी ही ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा के साथ सरकारी कामकाज एवं दायित्वों को समय पर पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था. वह अपने बचे समय का उपयोग घर के लोगों को सदआचरण एवं कर्तव्यबोध से सराबोर कारनामें में किया करता था. उसके ही साथ सरकारी सेवा में आए मित्र रामदीन की माली हालत श्रीधर से कहीं ज्यादा अच्छी थी, जिसे देख उसकी पत्नी और बच्चे मन ही मन श्रीधर की नेक नियति को कोसा करते थे पर श्रीधर हर रोज की तरह आत्मविश्वास से लबरेज हो अपनी दिनचर्या का अनुसरण करता. उसे रामदीन की ठाटबाट से कभी भी ईर्ष्या नहीं होती. इसके विपरीत वह रामदीन को ही समझाता रहता कि वह अपने बाल बच्चों पर कम से कम अपना प्रभाव ना छोड़े वरना जब सच्चाई सामने आयेगी तब उनके बेटे-बेटियों भी कहीं उससे नफरत ना करने लगे. रामदीन को श्रीधर की बातें अटपटी लग रही थीं. वह कहता-आखिर तुम्हारे ईमानदार बने रहने से भ्रष्टाचार तो नहीं मिट सकते. फिर तुम इस आचरण को अपनाने में परहेज क्यों करते हो? जहाँ उपर से नीचे भ्रष्टाचार का बोलबाला हो वहाँ सिर्फ तेरे और सिर्फ तेरे भ्रष्टाचारी नहीं होने से क्या मानते हो सिस्टम सुधर जाएगा? कभी नहीं !

किसने कहा मैं सिस्टम में सुधर की बात करता हूँ-श्रीधर ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा. मैं तो वही करता हूँ जो सिस्टम कहता है, चाहता है. मैं तुम्हीं से पूछता हूँ कि क्या सिस्टम यह कहता है कि किसी व्यक्ति का काम हो भी जाए और जबतक उससे कुछ रूपये पैसे ना मिले तब तक यह कहो कि उसका तो काम हुआ ही नहीं, श्रीधर ने बेबाक लहजे में कहा.

अब छोड़ो भी, कहो कैसा चल रहा है? बच्चे सब ठीक-ठाक तो है ना? रामदीन बड़े व्यंग्य के लहजे में पूछा. सब ठीक-ठाक है. बस चाहता यही हूँ कि इसी तरह बाकी बची सेवा कट जाए फिर तो सेवानिवृति के दौरान आयी व्यस्तता में कमी को दूर करने के लिए अभी से ही कुछ साहित्यिक अभिव्यक्ति देने और उसे लिखने की आदत डालने की सोच रहा हूँ, श्रीधर ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा.

मेरे पास तो तुम्हारे जैसा लिखने-पढ़ने का वक्त बचता ही नहीं है. अब देखो सीनियर आफीसर तो सभी लोगों से सीधे मुँह बात तो कर नहीं सकते. उनकी भी प्रतिष्ठा है. वे रिजर्व रहना ही ज्यादा पसंद करते हैं और इधर लोगों का काम भी होना है. आफीसर कब अंदर और कब बाहर है, इसकी तो मुझे ही जानकारी रखनी पड़ती है. लोगों के पेडिंग काम हो उसे भी आफीसर को देखते हुए मुझे ही खड़े होकर कराना पड़ता है. अगर इस एवज में कोई व्यक्ति मुझे उपकृत करता है तो इसमें किसका नफा और किसका नुकसान?

मेरा तो सारा समय समाज के लोगों के काम निवटाने में ही गुजर जाता है. यूं कहो कि समय ही कम पड़ जाता है. श्रीधर से रहा नहीं गया. वर्षों से वह रामदीन से एक सवाल पूछना चाहता था. आज उसे उस सवाल पूछने का अच्छा अवसर मानों मिल ही गया था. वह रामदीन से पूछ ही बैठा-अच्छा रामदीन बताओ, तुम जो कुछ भी करते हो चाहे वह अपने अफसरों की झूठी चापलूसी हो या फिर अवसरवादी बन सामान्य लोगों से रूपये-पैसे ऐंठने के काम, क्या यह सब अपने बाल बच्चों से या फिर अपनी पत्नी से कभी साझा करके देखा है?

अरे, क्या कहते हो? यह सब भला घर के लोगों के साथ साझा करने की बातें होती हैं? वह विस्मय में आकर बेल उठा. क्यों? आफीसरों से मिलकर उसकी काली कमायी में साझेदार बनकर हर रोज रूपये घर लाते हो और बड़े ही मासूमियत से उन पर झूठी सफेद चादर डाल अपनी भोली-भाली पत्नी के हाथों में डाल जाते हो और बड़े ही गर्व से कमाऊ पति होने का अहसास करा जाते हो. वह भी भोली सूरत लिए बिना कोई प्रश्न किये, पूछने की जरूरत भी नहीं समझती कि तुम रूपये लाए कहाँ से?

मुझे अब भी याद है कि एक बार भाभी के द्वारा इस पर सवाल किये जाने से तुमने उसे सदा के लिए छोड़ देने की धमकी तक दे डाली थी. उस दिन से भाभी तेरी आदत को नियति मान कर हर चीज स्वीकारती आ रही है. तेरी हरकतों का विरोध करने से ज्यादा उसे असहजता से ही सही पर सह लेना उसकी भी मानों नियति बन गई थी.

रामदीन की पत्नी राधा अपने पति की काली कमाई का उपयोग भूल से भी अपने बाल-बच्चों की भलाई में खर्च नहीं करती. रामदीन भले ही अपने मन से जो कुछ उपयोग की वस्तुएं घर लाता, वह अलग बात होती. पर महीने के अंत पर मिलने वाली पगार पर उसका ध्यान बरबस टिका रहता. कभी-कभी माहवारी वेतन देर से मिलने पर उसे असहजता का भी अनुभव होता पर उसे वह ये सोच सहजता से झेल जाती कि देर भले हो पर उसे मिलने में अंधेर तो नहीं ही थी. कुछ दिनों आगे-पीछे वह उसे रामदीन के माध्यम से मिल जाता था और वह महीने भर के बजट को अतिबुद्धिमता से व्यय करने में अपने आप पर गर्व महसूस करती. पर उसका मन हमेशा उद्धिग्न रहता. यह सोच कि कहीं वह भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहते-रहते कानून की गिरफ्त में ना आ फंसे. तब क्या वह समाज में उसी तरह मुँह दिखाने के काबिल रह पायेगी? क्या उसके भोले-भाले बच्चे अपने साथियों के बीच उसी स्वाभिमान के साथ अपने सर उठाकर समाज और दुनिया में रह सकेंगे? मैं सोचती हूँ, रामदीन क्यों नहीं सोच पाता? मैं तो उससे कब का कह चुकी हूँ कि मुझे उसकी काली कमायी के रूपये नहीं चाहिए. मैं वैसे भी साधारण परिवार से ताल्लुकात रखती हूँ, पर प्रतिष्ठा की पूछो तो भूल से भी उस पर आँच न लगने दूँ. मैं तो घोर अचरज में पड़ जाती हूँ तब रामदीन अपने बेटों से बड़ी-बड़ी बातें करता है. बडे-बड़े सपने दिखाता है उसे कि वह मन से पढ़ाई कर देश और दुनिया का नाम रौशन करे. बुरी आदतें ना पालें वगैरह-वगैरह. बच्चों को रामदीन समझाने एवं अच्छी शिक्षा देने में कोई कंजूसी नही करता पर खुद वो वैसा करने में क्यों अपने को असहज पाता है, यह सब बातें उसकी पत्नी को हमेशा सालती रहती.

सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के वर्षों से खाली पड़े विभिन्न पदों की भर्ती का विशेष अभियान चला रखा था. सरकारी दफ्तरों में जाति प्रमाण पत्रों के बनवाने की मानो होड़ सी लग गयी थी. रिक्तियां जो ढ़ेर सारी थीं. इधर प्रमाण पत्र बनाने वालों की संख्या में सभी दफ्तरों में कमी देखी जा रही थी. कुछ लोग अगल-बगल तो कुछ नजदीक संबंधों की दुहाई देकर दफ्तरों में अपना काम समय रहते निकलवाने की जुगत में भिड़े थे. उसी जुगत में रामदीन के बड़े लड़के के दोस्त का बड़ा भाई रमेश भी था जिसने चार दिन पहले अपनी जाति का प्रमाण पत्र लेने के लिए दफ्तर में अर्जी दी थी परंतु अब तक उसे प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया था. आज जब उसने दफ्तर में अपने प्रमाण पत्र के बारे में तहकीकात की तो उसे दफ्तर के ही एक कर्मचारी ने 200 रूपये की मांग की थी तो वह ठिठक गया था. उसे याद आया कि क्यों नहीं वह अपने छोटे भाई के दोस्त अनिल से इसमें मदद ली जाए. उसके पिता तो सुना है इसी दफ्तर में काम करते हैं. पर मैं उसे और वे मुझे पहचानेंगे कैसे, उस पर जब प्रमाण पत्र बनवाने वालों की इतनी भीड़ हो. और तो और दो सौ रूपये के लिए अगर मैं पने छोटे भाई का सहारा ले, थोड़ी बहुत पैरवी भी कराउं तो कहीं वे लोग ऐसा ना चोच लें कि हमारी औकात भी क्या इतनी नहीं? फिर कहीं मेरे छोटे भाई की उस परिवार से सहज और प्राकृतिक रूप से उपजी दोस्ती की फसल कहीं ना उजड़ जाए.

सुरेश का ह्दय जरूर विशाल था परंतु जीवन उतना ही कंटकपूर्ण. उसने मन बना ही लिया कि वह अपनी माँ के उसी दफ्तर से प्राप्त बृद्धापेंशन की राशि, जो अब तक पूरी तौर पर खर्च नहीं हो पायी थी, से दो सौ रूपये लेकर कल दफ्तर खुलते ही समय पर वहाँ पहुंचकर अपना काम करवा ही लेगा. सुरेश ने अपने मन की सारी बातें माँ से कह डाली. उधर उसका छोटा भाई पढ़ाई करने के साथ-साथ भाई और माँ के बीच हुए बार्तालाप को सुनता जा रहा था. उसने भी यह ठान लिया कि दोस्ती रहे या जाए पर वह माँ के पेंशन के रूपयों को यूं बर्बाद होने नहीं देगा.

सच कहा गया है कि मजबूरी इंसान को समय से पहले परिपक्व कर देती है जैसे एथीलीन कच्चे फलों को पका देता है. नौकरी के लिए दी जाने वाली अर्जी की अंतिम तिथि भी नजदीक आ चुकी थी. सुरेश माँ के बृद्धापेंशन के दौ सौ रूपये अपनी जेब में लिये पूरे आत्मविश्वास के साथ दफ्तर की ओर कूच कर चुका था. उधर उसका छोटा भाई भी अपनी योजनानुसार माँ के पेंशन के रूपये को बचाने की जुगत में जुट गया था. सुरेश दफ्तर पहुंचता है. जिस व्यक्ति ने उससे प्रमाण पत्र के एवज में रूपये मांगे थे, उसे ईमानदारी से रूपये थमाते हुए ज्यों ही प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए उसकी रजिस्टर में अपना हस्ताक्षर बना रहा था, उसका छोटा भाई देख रहा था. वह और कोई नहीं उसी के दोस्त का पिता था जिसने प्रमाण पत्र के एवज में उसे बडे भाई से दो सौ रूपये लिये थे. सुरेश की नजर अपने लक्ष्य पर थी वह प्रमाण पत्र को अपने सीने से यूं लगाते दफ्तर छोड़ चुका था मानों वह जाति प्रमाण पत्र नहीं उसकी अंतिम नियुक्ति का प्रमाण पत्र रहा हो.

इधर सुरेश के छोटे भाई का दोस्त अनिल उसके छोटे भाई के साथ अपने ही बाप की इस करतूत पर थू-थू कर रहा था. उसकी नजरें जमीन में गड़ी जा रही थीं. वह असहज महसूस कर रहा था मानों उसके पांव तले जमीन खिसक गई हो. वह अपने को कोसता हुआ अपने दोस्त के साथ घर वापस आ गया और सदा के लिए उस दोस्त से अलविदा कहने के अंदाज में अपने दिल की बात कह डाली-‘मुझे भूल जाओ मेरे दोस्त. किसी ने सच कहा है-दोस्ती बराबर वालों में टिकती है. तुम, तुम्हारा परिवार मुझसे कहीं ज्यादा महान है. तेरी और मेरी दोस्ती बराबरी की नही. मैं तुच्छ, तू श्रेष्ठ है.”

उसे अपने दोस्त से यह सब सुन कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. उधर रामदीन की पत्नी की तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी और फिर प्रमाण पत्रों के बनाने की भीड़ भी कम होने के चलते रामदीन वक्त से पहले, अपने आफिसर से छुट्टी ले घर लौट आया. घर पर उन बच्चों को देख सहज भाव से पूछ बैठा-अरे, तुमलोग आज स्कूल नहीं गए? इम्तिहान भी तो तुम लोगों के नजदीक हैं. यूं ही वक्त जाया नहीं करते. यह तो संयोग है कि मैं आज सबेरे ही आफिस से चला आया और तेरी चोरी पकड़ी गई. अभी से संभल जाओ वरना इम्तिहान में अच्छा ना कर पाओ तो हमें नहीं कोसना.

सच कहा बापू. यह संयोग है कि मेरी चोरी पकड़ी गई. पर उससे भी बड़ा संयोग….यह कहते उसने दफ्तर की सारी घटना उसे सुना दी. रामदीन को मानो सांप सूंघ गया हो. वह जितना अपने सर को छिपाना चाहता उतना ही बेपर्द होता जा रहा था. वह अपने किये पर खुद को धिक्कार रहा था. उसे रह-रह कर श्रीधर की बातें झकझोरती जा रही थी. उसने प्रायश्चित करने का ठान लिया कि वह तब तक दफ्तर नहीं जाएगा जब तक कि इस शहर से उसका स्थानांतरण ना हो जाए. उसने अपने बेटे और उसके दोस्त को गले लगा लिया और माफ कर देने एवं विनती के लहजे में, आँखों में प्रायश्चित के आंसुओं का समुद्र संजोये, अपनी पत्नी के कंधे पर अपना सिर इस तरह रख डाला मानों वह पुनर्जन्म की तलाश कर रहा हो.

राजेश कुमार पाठक
पॉवर हाउस के नजदीक
गिरिडीह-815301
झारखंड़