हिन्दुस्तान (झेलम तट, राजबाग – 07 जून 1969)

|| हिंदुस्तान ||
(झेलम तट स्थित राजबाग से 07 जून 1969 को)

कितना महान प्यारा हिन्दुस्तान है |
नागराज कि ऊँचाई देशाभिमान है ||

कश्मीर भारत वर्ष का शाश्वत ईमान है |
इस पर न्योछावर तन-मन अनमोल प्राण है ||

पावन पवित्र नदियाँ उपवन हरे भरे हैं |
भारत के स्वर्ग में आकर अभी खड़े हैं ||

इस पर नजर दुश्मन की लगने नहीं देंगे |
हो तोप अथवा बन्दूक दगने नहीं देंगे ||

कहती कथा रामायण जीवित पुराण है |
या वेद ज्ञान उपनिषद मुरली की तान है ||

संसार कि संवेदना का कोष है भारत |
सत्य अहिंसा का उद्घोष है भारत ||

संतरी यहाँ हजारों कर्मठ जवान हैं |
मोती उगाने वाले कर्मठ किसान हैं ||

बहती विमल गंगा गीता प्रमाण है |
कर्म कि कुशलता का भारत प्रमाण है ||

लिप्सा नहीं है इसको विस्तारवाद की |
राह इसकी एक है समाजवाद की ||

युद्ध से नफरत इसे है सत्य मानिये |
ललकार पर तैयार है यह सत्य जानिए ||

डरता नही धमकियों से काल है भारत |
लड़ता नही किसी से कमाल है भारत ||

‘भूदेव’ का सदा से बस एक ध्यान है |

कितना महान प्यारा हिन्दुस्तान है ||

: पं. हरिश्चन्द्र पाठक ‘भूदेव’,
पूर्व आचार्य राम रतन उच्च विद्यालाय, ढोरी

अंतर्मन (१९६०)

|| अंतर्मन ||

अंतर्मन का सोया विषाद, क्यों चिल्लाता है बार-बार.

भगवान बोल, होता कैसा? जिस बेटे का लुट गया प्यार.

माँ-बाप हेतु बालक रोता, भगवान स्वर्ग में सोता है.

दुःख जलनिधि में लगता गोता, शैशव धरती पर सोता है.

चिंतित जीवन, धूमिल प्रभात, समता पर भीषण वज्रपात.

रहता है मौन वह दिन-रात, रटता है बालक, विगत बात.

माँ किधर गई? कहाँ तात? है तिमिर घोर पथ अज्ञात.

आँखों से झरता है प्रपात, अब होगी फिर क्या मुलाकात.

सुकुमार-सरलता-भोलापन, सब पर कठोरता का बंधन.

गर भरा धूल से यह चंदन, ईर्ष्या के सर्पों का दंशन.

गर उजड़ गया हँसता उपवन, होगा अनाथ यह जीवन धन.

बालक पर स्नेहिल छाया हो, घर-भर की ममता-माया हो.

गदगद शैशव की काया हो, जब सब अंचल की छाया हो.

अब आंसू से कर ले तर्पण, शव पर कर ले माला अर्पण.

कह बार-बार तू हरे-राम! माँ-बाप गए हैं अमर धाम.

कुलदीपक तू एकाकी है, कठिन परीक्षा बाकी है.

जग-ज्योति जलाना तुम बेटे, मत रहना तुम घर में लेटे.

संभव है उर पर लगे घाव, दे चला जमाना नया दाव.

खिल रहा कंटकों में गुलाब, मिल रहा स्नेह-संयत स्वभाव.

एकलौता बेटा धरती पर, भगवान नजर रखना उस पर.

बांका फिर बाल नहीं होगा, दुश्मन या काल कोई होगा.

बरसाता हूँ आशीष पुत्र, जीवन होगा तेरा पवित्र.

हे पुत्र! बड़ी दुनिया विचित्र, इस दुनिया के तुम बनो मित्र.

सद्भाव-सरलता-भोलापन, करवट लेता शत-शत हजार.

अंतर्मन का सोया विषाद, चिल्लाता है रे! बार-बार.

मित्रों का अलबम

|| मित्रों का अलबम ||

जीवन के बने अनेक चित्र,
कुछ नए-पुराने कुछ विचित्र.

मेरे अनेक मुंहलगे मित्र,
दिल की खूँटी पर टंगे मित्र.

कुछ भूल गए थे वे विचित्र,
कुछ लगते है अबतक सचित्र.

मिलता लेकर अरमान मित्र,
झिलमिल होती पहचान मित्र.

जीवन यौवन जंजाल मित्र,
‘भूदेव’ हुआ कंगाल मित्र.

दुश्मन देता है ताल मित्र,
दंशन का नित्य कमाल मित्र.

इस जीवन में सब टका मित्र,
वह सबका क्या हो सका मित्र.

दलबदलू और दलाल मित्र,
ओढें चाँदी का खाल मित्र.

उनके घर मालामाल मित्र,
जिनके घर मायाजाल मित्र.

जब गया द्वार, दरबार मित्र,
मिलती केवल फटकार मित्र.

दुःख में हैं दयानिधान मित्र,
सुख में शेखी-शैतान मित्र.

मेरे अनेक यजमान मित्र,
करते मेरा सम्मान मित्र.

आशीष-दुआ का दान मित्र,
निश्चय होगा कल्याण मित्र.

कुछ लोग यहाँ व्यवधान मित्र,
आगत-स्वागत जलपान मित्र.

जीवन की नौका टकराती,
जल के भीतर चट्टान मित्र.

तन रहे धनुष पर वाण मित्र,
ले रहे मित्र की जान मित्र.

कलियुग के द्रोणाचार्य मित्र,
हैं तितर-बितर परिवार मित्र.

मिथ्यावादी आचार्य मित्र,
आदत से हैं लाचार मित्र.

विद्या-मंदिर बीमार मित्र,
आहत अजगर खूंखार मित्र.

मंदिर सुन्दरतम है पवित्र,
पढ़ते भक्त प्रहलाद मित्र.

उर के अलबम में सजे चित्र,
सब मित्र मेरे अतिशय पवित्र.

नाटक : भाग – २

दृश्य-दूसरा
(नवल और प्रकाश आपस में बातचीत करते आ रहे हैं)

नवल – प्रकाश! हमलोग चार हैं. मैं, तुम विमल और कमल. हमलोगों ने एक साथ विद्याध्ययन किये. सम्प्रति हमलोगों की हालत बिलकुल दयनीय है. पारिवारिक दिक्कतें जल प्रवाह कि भांति हमलोगों की ओर बढती आ रही हैं. हमलोगों के घर में माँ हैं, पिता हैं और भाई-बहने भी हैं. इन सबों का भरण पोषण कैसे हो?

 
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नाटक [ दृश्य – ०१ ]

नाटक
[ दृश्य-०१ ]
पर्दा उठता है.

मकान विमल का
(फूस का घर है, घर कि दीवारें चिकनी मिट्टी से पुती हैं. सर्वत्र स्वच्छता है. गन्दगी का कहीं नामो निशान नहीं. इसी घर में विमल एक दूसरी चटाई पर बैठा कुछ सोच रहा है. तभी कमल का प्रवेश कर रहा होता है.)

कमल – भाई विमल! जब-जब मैं यहाँ आता हूँ, तब-तब तुम्हे गंभीर चिंतन में देखता हूँ. क्या किसी अनुसन्धान के पीछे लगे हो?

विमल – हाँ, अनुसन्धान ही समझो.

कमल – क्या मैं जान सकता हूँ कि आखिर वह अनुसन्धान क्या है? विज्ञान तो तुम्हारा विषय नहीं था, फिर अनुसन्धान कैसा? तुम तो समाजशास्त्र के योग्य छात्र हो.

विमल – ‘विज्ञान’, का अध्ययन करने से ही अनुसंधान का कार्य होता है? समाजशास्त्र के विद्यार्थी को भी तो समाज कि रहस्यमयी स्थिति का अनुसन्धान करना है.

कमल – तो वर्तमान समाज की इस दयनीय स्थिति पर हम साथियों का कुछ विचार हो. थोड़ी देर ठहरो, मैं अभी नवल और प्रकाश को लाकर इसमें शामिल करता हूँ. (कमल जाता है.)

विमल – (स्वतः) कमल आया, चला गया. आज के समाज का वातावरण नीरस हो रहा है. मानवता की जगह पशुता ही बलवती है. धनी मानी मौज उड़ाते हैं. गरीब जुल्म की क्रूर चक्की में पिस जाते हैं. हमलोगों के साथ भी यही बातें हैं घर में एक दाने भी नहीं, जिससे माता पिता को भोजन करा सकूं. मुश्किल से पेट भरते हैं. कभी-कभी तो एकादशी व्रत ही रहा करते हैं. ओह! कलेवर शिथिल हुआ जाता है. (साहस करके) लेकिन नहीं. मैं साहस करूं. परिवार कि सहायता के लिए, गाँव एवं देश की सहायता के लिए कमर कसूं. (आकाश की ओर संकेत करके) ओ, निस्सीम व्योम में वास करने वाले देव, सुनो! तुम्हारी सृष्टि का यह भिखारी मानव निर्धनता के कठोर कारावास से मुक्त होने के लिए सहायता चाहता है. क्योंकि तुम दु:खहरण कहलाते हो. (माँ की आवाज सुनकर) हैं! यह किसकी आवाज है. (सामने देखकर) यह तो माता जी आ रही हैं. पुत्र के मुख पर उदासी देखकर वह स्वयं दुखी हैं. माता जी प्रणाम! (चरणों पर गिरता है).

कर्मवती – दीर्घायु हो बेटा!

विमल – माँ! क्या आज्ञा है?

कर्मवती – कुछ नहीं. सिर्फ कुछ खाने के लिए बुलाने आई हूँ. तुम बराबर दुखी क्यों रहा करते हो बेटा? भगवान ने जैसा चाह बनाया, इसकी चिंता ही क्या! चलो पिता जी बुला रहे हैं.

विमल – माँ! तुम धन्य हो. मेरे जीवन दे प्रारंभिक काल से आज तक वात्सल्य प्रेम दिखाने वाली जननी! तुम धन्य हो. तुम्हें करोड़ों प्रणाम है.

(दोनों जाते हैं, पर्दा गिरता है.)