अछूत – ०३

अछूत, राजेश पाठक की कहानी

इसके पहले की कहानी पढ़ें:

नजर में असर होता है. नजर टेढ़ी हो, तो उसके अलग और सीधी हो, तो अलग मायने निकल आते हैं.

आपकी टेढ़ी नजरें मुझे भले अछूत मानती हों, पर नजरें सीधी कर दें, तो वहीं मेरा सौम्य चेहरा बरबस आपको अपना ही पुत्र मान लेने का विस्मयकारी एहसास करा जायेगा. जिन सवालों के जवाब खोजे भी नहीं मिलते, अगर उनके जवाब कूड़े-करकटों पर बिखरे पन्नों में मिल जायें, तो उसे लोग छोड़ा नहीं करते. उन्हें यूं सहेज कर रख लेने में कोई परहेज नहीं करते. जो कूड़ों-करकट की परवाह करते हैं, वे अपनी जिंदगी खुद ही तबाह करते हैं. बच्चे को स्कूल आने से मत रोकिये, वह बहुत कोमल है. उस पर अपने विचार मत थोपिए. रूंधे स्वर में प्रधानाध्यापक सुरेश ने कहा.

आपका क्या? प्रधानाध्यापक एक लय में कहे जा रहे थे, आप तो इतने रसूखदार हैं कि सरकार के सहारे मेरा स्थानांतरण इस स्कूल से किसी दूसरे स्कूल जब चाहें करा दें. पर, क्या बच्चों में मेरे प्रति स्वाभाविक रूप से उपजी गुरु भक्ति, अपने शिष्यों के प्रति पैदा हुई मेरी उस आसक्ति को किसी के सहारे मिटा पायेंगे?

शायद नहीं, क्योंकि गुरु भक्ति हो या गुरुओं की शिष्यों के प्रति आसक्ति, इसे कानूनों के मोहताज नहीं बनाये जा सकते. क्या सोचते हैं, प्रधानाध्यापक सुरेश कहे जा रहे थे कि एक अछूत, जो पाठ अपने शिष्यों को पढ़ाते आया है, आपके ही दरवाजे पर आ कर आपको ही पढ़ा गया. नहीं, कदापि नहीं. यह तो वह पाठ है, जिसे आप, हम, हर कोई अपने-अपने बालपन में पढ़ा होता है. कालचक्र के वक्र होते बहुसंख्यक इसे भूल जाते हैं. मैं उसी कालचक्र की वक्रता को सीधा करना चाहता हूं.

बाबूजी! मैं सोचता हूं कि कोई अपने में ही समायी अज्ञानता, अशिक्षा एवं दंभ को अछूत क्यों नहीं मानता? काश! कोई इसे ही अछूत मानता और इस अछूत को भी अपना ही पुत्र जानता. प्रीतम सिंह अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश की बातें इस तरह अवाक् हो सुनता जा रहा था, मानो उसके मुंह से निकली अमृतवाणी उसे आत्मग्लानि का बरबस एहसास करा रही हो.

वह प्रधानाध्यापक के आत्मविश्वास एवं निर्भीकता को देख हतप्रभ था. जब प्रधानाध्यापक ने अचानक बोलना बंद कर दिया, तो प्रीतम सिंह हठात बोल पड़ा- बोलते जाओ. पता नहीं आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मेरा अंतर्मन जाग रहा है. इस जग रहे अंतर्मन को पूरी तरह जगा देना चाहता हूं. कोई इसे भले ठगना कहता हो, तब भी मैं ठगा जाना चाहता हूं. आज मुझे एहसास हो रहा है कि संस्कार किसी जाति का मोहताज नहीं. संस्कार मोहताज भी है, तो प्रधानाध्यापक जैसे दृढ़ निश्चयी, वीर्यवान और शौर्यवान लोगों को, जो निडर हो बेबाक सच्चाई बयां कर जाता हो और लोगों की कोई चाहत न भी हो, तो अच्छाई उनके घर कर जाता हो.

प्रीतम सिंह अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ. उसे लग रहा था मानो वर्षों बाद उसे जीवन के दर्शन हुए. वह अछूत प्रधानाध्यापक को अपना जीवन समझ उसे अपने में आत्मसात कर लेना चाह रहा था. मानो उसके ऐसा नहीं करने से वह जीवन से ही जाता रहेगा. उसने प्रण किया कि आज और अभी से सागर पर उससे कहीं ज्यादा प्रधानाध्यापक का अधिकार है. सागर के जीवन की चिंता करना उसके लिए बेकार है, क्योंकि अब पुत्र तो पुत्र, उसे भी प्रधानाध्यापक के विचारों की अधीनता स्वीकार है.

इन सबों के बीच प्रीतम सिंह की आंखों से बहती प्रायश्चित रूपी अश्रु की धारा अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश की आंखों से बहते स्वाभिमान और विवेक की अश्रुधारा में इस तरह विलीन हो रही थी, मानो नदियां समुद्र में मिल अपनी चिरस्थायी शांति को प्राप्त कर रही हों.

समाप्त.