अछूत – ०२

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यह कितना आश्चर्य भरा है कि गंदगी तो सभी पैदा करनेवाले होते हैं, पर कुछ ही होते हैं, जो उस पैदा की गयी गंदगी को स्वयं साफ करते हैं और बहुसंख्यक ऐसे होते हैं, जो उन मजबूर लोगों की तलाश में जुट जाते हैं, जो अपने जीवन अस्तित्व को रखने के लिए उनके द्वारा पैदा की गयी गंदगी को साफ कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना चाहता हो.

यह सच है कि प्रधानाध्यापक सोचे जा रहे थे, कि मजबूरियां इनसान को कर्म करने की ओर प्रेरित करती हैं. मेरा तो मानना है कि मजबूरियों से उपजी कर्म की दिशा और दशा चिरकाल तक स्थायी नहीं हो सकती, क्योंकि मजबूरियां मिटते ही कर्म की दिशा बदल जाती है.

मजबूरियां समाज में उच्च जाति एवं वर्ण माने जानेवाले लोगों को भी जूते साफ कर भी धन अर्जन को मजबूर कर देती हैं, तब उस व्यक्ति या परिवार को हम मोची का स्थायी नाम क्यों नहीं दे पाते? क्यों नहीं उनकी जातिगत श्रेष्ठता कर्मगत श्रेष्ठता या निकृष्टता में विलीन हो पाती है? आज मुझे क्यों लोग अछूत कह कर अछूत मान लेना चाहते हैं, जबकि मैं ज्ञान अनुभवों से लोगों के बीच सुसंस्कार बांटता हूं? सच कहूं, तो जाति तो कर्म की दासी है.

कर्म स्थायी हो, तो जाति स्थायी हो सकती है. परंतु, सच यह है कि कर्म स्थायी या समरूप स्वरूपवाला हो ही नहीं सकता. परिस्थितियों का दास बना व्यक्ति एक कर्म से दूसरे कर्म को सदा स्थानांतरित होता रहता है. मुझे नियत कर्म से उपजी वर्ण व्यवस्था को मान लेने में कोई अचरज नहीं, पर तब उनलोगों की जाति, जो अपनी मूल जातिगत कर्मों से विलग हो कर अन्य जातिगत कर्मों में स्वयं को आत्मसात कर अपने जीवन का आधार बना लेते हैं, को धर्म परिवर्तन की तरह जाति परिवर्तन के अधिकारों को क्यों नहीं मान्यता मिली?

सच तो यह है कि कर्म के स्वरूप का वर्गीकरण काल, समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप सदा अस्थायी एवं परिवर्तनशील होता है.

प्रधानाध्यापक के मन में खुद तरह-तरह के सवाल पैदा होते जाते, उनका मस्तिष्क स्वयं उनका हल ढूंढ़ता जा रहा था. बस आवश्यकता इस बात की रह गयी थी कि उसके मस्तिष्क द्वारा ढूंढ़े जा रहे हल को समाज सहजता से मान्यता प्रदान करने में असहज महसूस नहीं करता, परंतु समाज को इस पारंपरिक मान्यताओं की वर्जनाओं से मुक्ति प्रदान करना उतना भी सहज नहीं था और यह भी सच था कि प्रधानाध्यापक भी हार माननेवालों में से नहीं थे. वह उस व्यक्ति के दंभ, अहंकार, कुंठाधारित अस्त्रों से उसे ही घायल कर उस पर अपने विवेक एवं चातुर्य का मरहम लगा कर सदा के लिए उसे इस रोग से मुक्त कर देना चाहते थे.

वह बच्चों में घर करते जा रहे सुसंस्कारों के हथियार से उसके ही अभिभावकों में जातिगत दंभ और अहंकार के शत्रु का विनाश कर देना चाहते थे, जो किसी न किसी रूप में बच्चों के व्यक्तित्व के समुचित विकास को बंधक बना रखा हो.

धीरे-धीरे सभी बच्चों ने प्रधानाध्यापक से प्राप्त शिक्षा को व्यावहारिक जीवन में उतारना शुरू कर दिया था. अपने ही माता-पिता व वरिष्ठ लोगों द्वारा समाज-परिवार में बरती जानेवाली विसंगतियों के प्रति विरोध जताना शुरू कर दिया था. उच्च जाति के बच्चे निडर हो अपने से निम्न जाति के बच्चों के साथ खुल कर मिलना, उनके घर आना-जाना बेरोकटोक शुरू कर दिया था. निम्न जाति के टोलों में बसे बच्चों के साथ हृदयंगम होने लगे थे. ऊंच-नीच के भेदभाव की दीवार बच्चों के बीच बालू की भीत की तरह ढहते जा रहे थे.

यह सब उच्च जाति के अधिकतर लोगों को नागवार लग रहा था. उन लोगों ने अपने बच्चों को गांव के इस स्कूल में नहीं पढ़ाने की योजना बनानी शुरू कर दी थी. इसी योजना के तहत सर्वप्रथम उनलोगों ने यह तय किया कि इस गांव के प्रीतम सिंह, जिसे जाति एवं धन दोनों ही दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता था, अपने बच्चे सागर को स्कूल भेजना बंद करें. प्रीतम सिंह ने लोगों की बात मान कर सागर को स्कूल जाने से मना कर दिया. सागर के स्कूल नहीं गये कुछ दिन गुजर चुके थे. तब अछूत प्रधानाध्यापक सुरेश ने फैसला किया कि क्यों नहीं सागर के इस तरह अचानक स्कूल न आने की सुधि लें.

उस पर सागर जैसा लड़का, जो धीर-गंभीर स्वभाव का होने के साथ-साथ कम उम्र में ही जीवन-दर्शन को आत्मसात कर लेनेवाला था. प्रधानाध्यापक को रहा नहीं गया. वह प्रत्येक शनिवार की शाम स्कूल बंद होने पर अपने घर जाया करते थे, पर इस शनिवार को उन्होंने अपने घर न जा कर सागर के घर उसकी खोज-खबर लेने का मन बना लिया. एक राहगीर की मदद से प्रधानाध्यापक सागर का घर आसानी से ढूंढ़ कर पहुंच गये. उसके घर से सटा एक दालान था, जिसमें से कुछ लोगों की बातचीत की आवाज आ रही थी. प्रधानाध्यापक ने दालान पर पहुंच कर दोनों हाथ जोड़े अपना परिचय देते हुए सागर से मिलने की बात कही.

‘क्या तुम सागर से ही मिलना चाहते हो? मुझसे नहीं मिलोगे? मैं सागर का बाप हूं, प्रीतम सिंह ने बड़े ही रौब में आ कर कहा- अहो भाग्य! आपके दर्शन हुए, प्रधानाध्यापक सुरेश ने कहा- क्या मुझे बैठने को नहीं कहेंगे? प्रधानाध्यापक ने आत्मविश्वास के साथ पूछा. कोई कुरसी अगर खाली पड़ी हो, तो बैठ जाओ, वरना तुम्हारी दो-चार फिजुल बातों को भी सुनने का वक्त फिलहाल मेरे पास नहीं है, प्रीतम सिंह ने घमंड के साथ कहा. प्रीतम सिंह तो ऐसे अवसर की तलाश में था ही, जबकि वह अछूत शिक्षक का मान-मर्दन करे.

उसे लगा मानो वह अवसर उसे आज मिल ही गया. वह इस आये अवसर को गंवाना नहीं चाहता था. कुरसियां खाली न होने से प्रधानाध्यापक ने खड़े-खड़े ही बिना देर किये सागर के कुछ दिनों से स्कूल नहीं आने की वजह जाननी चाही. सागर मेरा बेटा है. उसे स्कूल भेजूं या ना भेजूं, तुझे तकलीफ क्यों? प्रीतम सिंह ने बड़ी हेकड़ी के साथ कहा. सागर सिर्फ और सिर्फ आपका बेटा है, यह आपने कैसे मान लिया? प्रधानाध्यापक सुरेश ने प्रत्युत्तर में कहा.

और नहीं तो क्या, वह तुझ जैसे अछूत का बेटा है? प्रीतम सिंह ने अकड़ कर अपनी बात कह डाली. बस बाबूजी बस! बहुत हो गया. आप भ्रम में थे कि मैं सागर से मिलने आया था.

मुझे तो सागर पहले ही आपके बारे में, आपकी सोच के बारे में बता चुका था. सच तो यह है कि मैं आपसे ही मिलना चाह रहा था. मैं जानता हूं, मुझे सागर ने स्कूल नहीं आने की वजह पहले ही बता दी थी. उसकी गुरु भक्ति आपको इसलिए रास नहीं आयी कि मैं अछूत हूं. सच कहा आपने. भला एक अछूत जाति का आदमी उच्च संस्कारों की बात सोच भी कैसे सकता है? जो चीथड़ों और गुदड़ियों में पलता हो, भला मखमलों का एहसास उसे कैसे हो? पर, यह मत भूलिए कि कोई व्यक्ति महान तब होता है, जब दूसरों का अपमान न कर, उसके स्वाभिमान की रक्षा करता है और यह सब आपमें दिखायी देता है. मैं आपमें वह सब देख पा रहा हूं, जिसे आप चाह कर भी नहीं देख पा रहे. आखिर ऐसा क्यों?

इसके आगे की कहानी पढ़े अगले पोस्ट में.

राजेश पाठक

राजेश कुमार पाठक,
राष्ट्रिय कवि-संगम,
(प्रदेश सचिव, झारखण्ड ईकाई),
प्रखण्ड साख्यिकी पर्यवेक्षक,
सदर प्रखंड, गिरिडीह,
सम्प्रति : दुमका प्रखण्ड, झारखंड

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