सफ़ेद आसमान पर हरा चाँद : फुसरो ने मनाई पैगम्बर साहब की जयन्ती

सफ़ेद आसमान पर हरा चाँद : फुसरो ने मनाई पैगम्बर साहब की जयन्ती

जी हाँ, ईद-ए-मिलादुन्नबी अर्थात पैगम्बर साहब के जन्मदिन के उपलक्ष्य मनाया जाने वाला समारोह. फुसरो शहर में निकले जुलुस में जिस सफ़ेद झंडे का उपयोग किया गया जिसपर हरे चाँद और सितारे लगे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अमन के आसमान पर खिले हरे चाँद और सितारे मोहमद साहब का पैगाम दे रहे हों कि जब तक चाँद और सितारे रहेंगे इस्लाम यूँ ही अमन और शांति का पैगाम दुनिया को देता रहेगा.

जानें :
मिलादुन्नबी यानी इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्मदिन रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख को मनाया जाता है। हजरत मोहम्मद साहब का जन्म मक्का (सऊदी अरब) में हुआ था। उनके वालिद साहब का नाम अबदुल्ला बिन अब्दुल मुतलिब था और वालेदा का नाम आमेना था। उनके पिता का स्वर्गवास उनके जन्म के दो माह बाद हो गया था। उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया।

हजरत मोहम्मद साहब को अल्लाह ने एक अवतार के रूप में पृथ्वी पर भेजा था, क्योंकि उस समय अरब के लोगों के हालात बहुत खराब हो गए थे। लोगों में शराबखोरी, जुआखोरी, लूटमार, वेश्यावृत्ति और पिछड़ापन भयंकर रूप से फैला हुआ था। कई लोग नास्तिक थे। ऐसे माहौल में मोहम्मद साहब ने जन्म लेकर लोगों को ईश्वर का संदेश दिया।

वे बचपन से ही अल्लाह की इबादत में लीन रहते थे। वे कई-कई दिनों तक मक्का की एक पहाड़ी पर, जिसे अबलुन नूर कहते हैं, इबादत किया करते थे। चालीस वर्ष की अवस्था में उन्हें अल्लाह की ओर से संदेश प्राप्त हुआ। अल्लाह ने फरमाया- ‘ये सब संसार सूर्य, चाँद, सितारे मैंने पैदा किए हैं। मुझे हमेशा याद करो। मैं केवल एक हूँ। मेरा कोई मानी-सानी नहीं है। लोगों को समझाओ।’

हजरत मोहम्मद साहब ने ऐसा करने का अल्लाह को वचन दिया। तभी से उन्हें नुबुवत प्राप्त हुई। हजरत मोहम्मद साहब ने खुदा के हुक्म से जिस धर्म को चलाया, वह इस्लाम कहलाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है- ‘खुदा के हुक्म पर झुकना।’
स्रोत : वेबदुनिया हिंदी

आज जिस तरह दुनिया में इस्लाम की बदनामी हो रही है या कुछ चरमपंथी तत्वों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, ऐसे में यह बहुत जरुरी हो जाता है कि ऐसे मौकों पर और ऐसे जलसों द्वारा यह बताया जाये कि जो सही मायने हैं इस्लाम के वो क्या हैं. दुनिया का हर वो मुसलमान जो वास्तव में मुसलमान है अर्थात् जिसका इमान मुस्सल्लम है कभी इस्लाम से इतर सोच नहीं सकता, और जो इस्लाम के गलत मायने निकालते/समझाते फिरते हैं वो तो मुसलमान रह ही नहीं जाते.

इसलिए ये कहना कि दुनिया में आतंकवादी मुसलमान होते हैं न कहकर यह कहा जाना चाहिए कि जो मुसलमान आतंकवाद का रास्ता चुनते हैं वो फिर मुसलमान रह ही नहीं जाते जैसे किसी इन्सान ने अगर गलत रास्ता अख्तियार कर लिया तो हमारा समाज उन्हें इन्सान कह सकता है क्या? हम बेजा ही किसी धर्म को ही गलत बता बैठते हैं बगैर सोचे कि उसके बारे में हम जानते भी कितना हैं.

बात अच्छी चीजों के अमल में लाने से जुड़ी होनी चाहिए न कि वो अच्छी बातें हमें कहा से सिखने को मिल रही हैं यह सोचने के.