प्रथम वर्ष : अंक – 2
सितम्बर – 2017

विगत अद्यतन : 26-09-2017 | 00:01 बजे

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी,
तृतीयं चन्द्रघंटेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्,
पंचमं स्क्न्दमातेति 
षष्ठं कात्यायनीति च,
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ,
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

|| आप सभी को नवरात्री की शुभकामनायें ||


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कात्यायनी – ६

: : कात्यायनी : : -: माता के षष्ठम रूप के उपासना का मन्त्र :- चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना, कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानव घातिनि. माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है.  उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है.  योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत...

स्कन्दमाता – ५

: : स्कन्दमाता : : -: माता के पंचम रूप के उपासना का मन्त्र :- सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया, शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी. नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कंदमाता की उपासना का दिन होता है.  मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं.  माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति...

कूष्मांडा – ४

: : कूष्मांडा : : -: मां के चतुर्थ रूप के उपासना का मंत्र :- सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च, दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे. नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है.  इस दिन साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है. त्रिविध तापयुत संसार...

चन्द्रघंटा – ३

: : चन्द्रघंटा : : -: मां के तृतीय रूप के उपासना का मंत्र :- पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता, प्रसादं तनुते मह्यां चन्द्रघण्टेति विश्रुता. शक्ति के तीसरे रूप में विराजमान चन्द्रघंटा मस्तक पर चंद्रमा को धारण किए हुए है. माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है. नवरात्रि उपासना में तीसरे...

ब्रह्मचारिणी – २

-: : ब्रह्मचारिणी : :- -: मां के द्वितीय रूप के उपासना का मंत्र :- या देवी सर्वभूतेषु सृष्टि रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम: दुर्गा जी के दूसरे रूप का नाम ब्रह्मचारिणी है.  नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है.  साधक इस दिन अपने मन...

शैलपुत्री – १

-: : शैलपुत्री : :- -: मां के प्रथम रूप के उपासना का मंत्र :- || या देवी सर्वभूतेषु प्रकृति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम: || दुर्गाजी के पहले रूप को 'शैलपुत्री' के नाम से जाना जाता है.  शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण नवदुर्गा का सर्वप्रथम स्वरूप...

क्षणिकाएं : ०४

|| भगवान || भगवन इस संसार के कण-कण में तुम व्याप्त हो. सर्वव्यापी, अंतर्गामी, फिर भी पहुँच के पार हो. मैं वियोगी, प्रेमाभाव में माया-बद्ध जीवात्मा. किस विधि मिलूं मैं काट के बंधन, दया करो परमात्मा. योग न जानू, क्षेम न जानू, कर्म विधि न राग है. न त्याग, ना...

क्षणिकाएं : ०३

|| कर्मयोगी || दु:सह्य वेदना, असाध्यप्राय कार्य, श्याह लक्ष्य, निष्फल चेष्टा. शून्य प्रतिफल, व्यथा तेरे अंतर्मन की. हे! प्राण प्रतिष्ठित, किंचित न हो व्यथित, शांत कर उदवेदना, लक्ष्य का आह्वान कर, तू कर्मयोगी, माना भुक्तभोगी, भाग्य का सत्कार कर. क्या हुआ यदि गिर पड़ा, चोटिल हो निष्प्राण नहीं. चल उठ,...

क्षणिकाएं : ०२

|| वसुंधरा || सरस बरस रे मेघ तू, के रसहीन धरा हुई. न ओज है, न तेज है, असुध वसुंधरा हुई. कहाँ गई, मृदा की गंध, रंग की विचित्रता. पवन में वह सौम्यता, और पुष्प में मृदुलता. अतीत की घटामयी, सुखदायनी विस्मृतियाँ, थीं विश्व में जो श्रेष्ठ, वो संस्कृतियाँ कहाँ...

क्षणिकाएं : ०१

|| यौवन || आरूढ़ रश्मि रथ पे, नवजीवन की किरण. प्रफुल्लित मन मृदुल, तृप्त अनावृत यौवन. उच्छृल नदी प्रतिविम्बित, समृद्ध रवि रक्त कण. समीर मंद वेग में, उन्मत्त च्यूत जिर्ण पर्ण. विस्तृत क्षिति निजभाववश, चहुँ दिक वृत्त नील वर्ण. खग-वृंद श्रृंगकलवरत, मदसिक्त भू आसक्त मन. संयुक्त मुक्त भुक्त है, हो...
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